ग़ज़ल

।। ग़ज़ल ।।

दऽढ़  नै  रहि गेल  आस्थाक  चन्द्रमा।
भ’ गेलय आब जेहन लोकक आत्मा।।

एम्हर  ओमहर  चहूँ दिस की भेल जे।
नुकयला जा  कऽ  अहाँक परमात्मा।।

चलि  गेला  अज्ञात  तीर्थाटन  कोनो।
पुजेगरी  कत पुण्य करता गऽ जमा।।

दुःख  तँ  अनहद्द  ओहनो  होइत छै ।
सुख सेहो टीकए कोनोकि एक ठमा।।

अनिश्चय, संदेह,भय मे पड़ल  अछि
समाजक शासनक सब टा महकमा।।
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गंगेश गुंजन /16.10.'16

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