ग़ज़ल सन

ग़ज़ल सन

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सबटा  बूझल-सूझल अछि
सबठां घूमल-घामल अछि।

ओकरा  पासक  सभ ऐश्वर्य
हमरे सभ स दफ़ानल अछि।

भरि  पृथ्वीक गहूमक खेत
हमरे जोतल- तामल अछि।

आखिर कते  नचारी  गाउ
कंठ युगहि सं बाझल अछि।

दिग-दिगंत   पसरल   हल्ला
शुभ समदाओन जांतल अछि।

क्यो वैभव क्यो शासन ओ
सत्ता-मद मे  मातल अछि।

देश भेल अछि झुल्ला खाट
सैंतालिसेक गतानल  अछि।,

संसद   मे   तं  जे सत्ताक
बहरो खेल बेसाहल अछि।
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-गंगेश गुंजन। ६ मार्च, २०१८ ई.

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