यश का विलास !
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यश विलासी होना रचनाकार की मृत्यु है। पाठकों से मिला सामाजिक यश लेखक की सुविधा के संसाधन नहीं,उनकी पूंजी या धन भी नहीं बल्कि आज की भाषा में समझें-देखें तो यह, समाज और पाठक के आप में निवेश हैं।फिक्स्ड डिपॉजिट हैं। सूद समेत समाज को लौटाना,आपकी अघोषित नैतिक प्रतिज्ञा है। मानवीय उदात्तता अनन्त है जो कालजयी साहित्य ही उद्घाटित करता चलता है।
अतः समाज के लिए और भी उपयोगी,निरंतर और विशेष साहित्य रच कर-लिख कर पीढ़ियों तक आपको समाज में लौटाना पड़ता है। इस प्रकार यश,प्रशंसा, प्रतिष्ठा-पुरस्कार साहित्यकार को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर, व्यापक से व्यापकतम और समाज से दुनिया बनाने की तरफ़ बढ़ने के समाज से मिले हुए उत्तरदायित्व हैं।
यश-प्रतिष्ठा रचनाकार के विलास के अवसर नहीं होते।
आज साहित्य या समस्त कला विधाओं के रचना-संसार में जो समस्याएं हैं,बखेड़े हैं उनकी जड़ मैं यही मानता हूं।लेखक और रचनाकार अपनी प्रतिज्ञा पर तो नहीं रहेंगे मगर समाज से सबकुछ चाहेंगे। शायद इसीलिए पोथी-प्रकाशन,राजकीय पुरस्कार-सम्मान,संस्थागत-दान-दक्षिणा के तुच्छ तथाकथित साहित्य-सांस्कृतिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संजालों के दांव-पेंच, गतिविधियां इत्यादि की जो मारामारी है,ये जो तमाम विवाद हैं,परस्पर द्वेष है,एक दूसरे की क्षुद्र खिंचाई है,घटिया गुटबाजियां हैं ।
सुसज्जित ऐरावत पर अपने दालान-द्वार तक पधारे महाराज को भी,उनका दान अस्वीकार कर,सविनय राजधानी लौटाना होगा।
जो अयाची नहीं होगा वह सर्जक,कवि भी नहीं हो सकता है।
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गंगेश गुंजन 26 जुलाई 2018
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