साहित्य मे प्रासंगिकता

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साहित्य मे लिखल जाइत सभ सामयिक ओ यथार्थ सदा प्रासंगिक नहिं रहैत छैक। कालांतर मे रचनाक छुच्छ सामयिकता,ओहि भाषा- साहित्यक निंहेस भ’ जाइत अछि।
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-गंगेश गुंजन
२८ अक्टूबर,२०१८.

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