कुसियार काल !

कुसियार काल !
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नढ़िया तं बिना रोक-टोक कुसियार खा सकैये मुदा हमरा लोकनि मनुक्ख ताहू पर बाल बोध,छठिक भोरका अर्घ्य सं पहिने नवका कुसियार नहिं खा सकैत छी।मां पर तामस उठय तकर। कुसियार सन अमृत बस्तु खाय मे‌ कियेक रोकैये मां,जखन कि गिदड़ कहिया सं ने मजे मे चिबा रहलय खेतक उखियार ! बच्चा रही तहिया गुरुजन आ परिवार- संयम, धैर्य,जीह पर नियंत्रण आ एहन भावी संकट भरल जीवन जीयवाक ई अनुशासन सिखा रहल छलय से‌, नेना मे कहां बुझियै !
     एहि लप-लप करैत बजारक पाछां दौड़ि रहल विशाल उपभोक्ता- जीहक युग में आइ लाभ बुझाइए।    
     गोर लागै छी मां !
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-गंगेश गुंजन

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