भोर

भोर
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फल जकां सोहि रहलय ब्रह्मांड कें
उषाक आंगुर।
अन्हारक खोंइचा इजोत पर सं
छुटि रहलय,
प्रात भ’ रहलय।
ब्रह्माण्डक सोहल संतोला-सूर्य
उगलाह !
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-गंगेशगुंजन। २८.११.’१७ ई.

        

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