सोचबाक चाही !
🌿 🌿
एहि समाज व्यवस्था आअपना
लोकनिक जीवन-शैली मे कोनो
ख़ुशी भेटल नहि लगै छैक।
ककरो ने ककरो सं छीनल कि
लूटल ख़ुशी रहैत छैक,एत'धरि
जे मानवाधिकारक जायज़ ख़ुशी।
से कियेक?
ई बात सोचबाक नै चाही ?
😫!
गंगेश गुंजन
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