'रुचय तँ…मैथिली साहित्य मे..'
। आधार कार्ड ।
🙏
मैथिलीक एक नव देदीप्यमान नक्षत्र अप्रत्याशित हमरा बासा पर अयलाह। प्रणाम कयलनि। अति विनीत (अति विनीत एहि दुआरे जे पहिनहिं सं सुपरिचित विशिष्ट युवा कवि विनीत उत्पलक भ्रम नहिं हो) स्वर में कहलनि :
-सर डा.रमानन्द झा रमण जी कत' हम अपन रजिस्ट्रेशन कराब' चाहै छी।'
हम : कथीक रजिस्ट्रेशन ?' विस्मय भेल।
मैथिलीक देदीप्यमान नक्षत्र : जै में ओ फेसबुक पर नित्य भोरे-भोर कवि सब के कहै छथिन---
हम-‘मन पड़ैत छथि’ मे ? हठात हमरा पूछना गेल कि ओ बीचहि में कटैत बजलाह -नै-नै सर, 'जुग-जुग जीवथु’ वला,जनम दिन वला। जै में ओ नित्य भोरे-भोर फेसबुक पर कवि सब के बधाइ दै छथिन-'जुग-जुग जीवथु !
हम : ओ अच्छा। मैथिली मे अहूं लिखैत छी ?'
देदीप्यमान मान प्रतिभा: जी,मैथिली में गोड़ पांचेक कविता हमहूं लिख चुकलियै। दू-तीन टा आरो तैयारी मे छैक। एगो कहानी सेहो जे दिन ने पूरा भेलैए…' ओ युवकोचित गर्व सं बजलाह।
हम : वाह ! बधाइ। मुदा ऐ विषय मे हमरा सं अहां के की चाही ?'
देदीप्यमान मान नक्षत्र : कोइ कहलक जे ओ अहांक बहुत लगक संबंधी छथि।अहां कहबनि तं ओ मानि लेता आ हमर रजिस्ट्रेशन भ' जायत। से बिना पैरबीये तँ नै ने हेतै। ई बात सकाले भ' गेल रहतै तं भविष्य मे निश्चिंत रहबै सर।
हम : आह से तँ एक की, दू-दू टा संबंध हुनका सं। परम् प्रिय भागिनक साढ़ू छथि आ ज्येष्ठ जामाताक बहिनोई। ओना ई कहू जे सूचना दाता पजियार के ? ई कहलनि के?' जवाब दै मे ओ कनी असमंजसा गेलाह,बल्कि नरभसा गेलाह। संभवत: सूचनादाता मना कयने हेथिन। हमहूँ दोहरा क’ नै पुछलियनि। बूझल तं छले। मैथिली जगत मे ई काज आइकाल्हि एके टा क्रांतिकारी युवा कवि क' रहल छथि। कहलियनि :
-औ युवक सोचलौंहें तँ अहाँ ठीके। संबंधिक छथि मुदा हम कहबनि तं ओ मानिये लेताह से कोनो ज़रूरी छैक। दोसर जे ऐ एहन काज मे पैरबी। तथापि,कहू !
देदीप्यमान मान नक्षत्र : ओकर फार्म चाही। क्यो कहलक जे दिल्ली मे अहां लग अबस्से भेटि जायत। हम भारी विपत्ति में।एक रती तामसो उठल।
कहलियनि-पहिने ई कहूं जे अहां के हमरा लग पठौलनिहें के ? हम तं अहाँ के नै चीन्है छी।'
देदीप्यमान मान नक्षत्र : सर,हमरा नै चीन्है छी ? हमर चारि गो कविता फेसबुक पर छपि चुकलैये !' नहि चिन्हलिअनि से ओ पर्याप्त आश्चर्यित भेलाह। आहत सेहो बझयला। मुदा तेहन रुष्ट नहि भेलाह। बहुत धैर्य सं आगाँ कहलनि :
-मुनिरका मे डेरा रखने छियै। पता लागल जेएनयू में एक टा बड़ विद्वान प्रोफ़ेसर छथिन देवशंकर नवीन बाबू,मैथिली के बड़का आलोचको छथिन। ताकैत-ताकैत चलि गेलियै। तं उहै हमरा अहांक पता देलनि आ कहलनि जे - ‘ जाउ,सोझे चलि जाइत रहू काज भ' जायत।इहो कहलनि जे वैह नीक जकाँ फारम सेहो भरबा देताह। हमरा पीठो ठोकलनि-दनदनाइत रहू।'
नवीन जी पर तामसो उठल-हमरा संगे नवीन ई कोन रचना कयलनिहें।
खैर से तं हुनका सँ आब बादे मे पुरबासाही। एखन की करी। महामोस्किल तँ सोझां में ई।
-से ओ फार्म हमरा भरा दिअ’ सर। हम हुनका पता पर कोरिअर क' देबनि। हमर जन्म दिन अगिले मास पड़तै। रजिस्ट्रेशन भ' गेल रहतै तं हमरो जनमदिन फेसबुक पर आब' लगतै !' ओ परम उत्साहित रहथि।
हम : औ जी,हमरा नै बूझल अछि जे डा. रमण तकर कोनो फार्म भरबै छथिन वा,नहिं जानि ऐ बीच कोनो नियम बनौने होथि।कारण आब लेखक कविक,संख्या सेहो तँ बहुत बढ़ि चुकल छैक। मुदा जँ से फार्म छैको तँ हमरा लग नहि अछि। किएक रहत? आ कोन आधार पर प्रोफ़ेसर नवीन ई बात कहलनि।’ हम क्षुब्ध रही।
मैथिलीक देदीप्यमान नक्षत्र : सर,कोय कहलक जे अहां नव कवि सब के मदति क' दैत छियैक।बड़ उमेद ल' क' अहां पास आयल रही।' ओ बड़ उदास जकां भ' गेला। नव कवि पर कनी मात्सर्यो भेल। मुदा उपाय? कि तावत ई युक्ति फुरा गेल। हम हुनका डाक्टर रामानन्द झा रमणजीक टेलिफोन नं. दैत कहलिअनि :
-हे लीअ'! हुनका सं मुहांमुहीं अपने गप क' लेब। सबटा बुझाइयो देताह।
-चाह पीयब ?' पुछलिअनि।
-नै सर नै पीयै छियै।’ विनम्रता सं कहलनि।
-तँ एक गिलास शर्बते ! एतेक रौद मे हरान भ’ क’ आयल छी… '। कहलियनि।
-नै सर,पानी तं पीबे केलियै ने।'
प्रणाम क’ चलि गेलाह।
*
हम आब ताही दिन सं उत्कट शुभकामना संगे उत्सुकता सं आसा-बाटी में पड़ल छी जे कहिया ‘जुग-जुग जीबथु’ मे ओइ युवकक नाम पढ़ी।
🌿💐🌿
(उचितवक्ता डेस्क)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें