।। न'व पराभवक कथा ।।

        । न'व पराभव-कथा ।
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मैथिली साहित्यक आधार कार्ड वला पोस्ट फेसबुक पर देलाक बाद सं हम तं पराभव में पड़ि गेल छी।
भोरे भोर एक टा फोन आयल। नंबर रहय अनचिन्हारक (आशीष अनचिन्हार जीक नहिं!)।अपरिचित। हम नहिं उठौलियै। 'अपरचित फोन एंटरटेन मत करें' सतर्कता संदेश में ई काल्हिये फेर पढ़ने रहियै। मुदा पुनः फेर वैह फोन। तकरो कटलौं। तेसर बेर मन नै मानलक। जं ककरो जरूरी होइक। फोन उठौलौं।
-हेलो !'
-हेलो ! अपने गंगेश सर बजै छियै?' ओम्हर सं जिज्ञासा भेल।' मैथिली सुनि मन चैन भेल।
-जी। अपने ?'हम आह्लादित होइत पुछलिअनि।
-सर,हम....मिश्र बजै छी,दिल्ली, आया नगर सं।'
अलबत्त नामकरण-आया नगर ! तखन तं गया नगर सेहो हेतैके कोनो। मन में आयल।आ कि
ओम्हर सं ताबड़तोड़-हेलो-हेलो आब' लागल।
-हं-हं। कहू ने,सुनि रहल छी।' हम कहलियनि।
-सर डाक्टर रमानंद झा रमण जी सं एक टा जरूरी काज छल। अपने सहायता करी।' (आधार कार्ड वला पोस्टक बाद फेसबुक पर हमरा तं पराभव भ' गेलय।) आब जानि नहि ऐ सज्जन कें की काज छनि!
- मुदा रमण जी एतेक प्रशस्त लोक छथि। अपने सोझे संपर्क कियेक ने क' लैत छी?'
- सर हमरा नहि चीन्हैत हेताह तें कनी…'
मन मे तं भेल कहिअनि-  हमहीं कोन चीन्है छी…? मुदा दु:ख होइतनि।नहिं कहल भेल। मुदा समस्या तं‌ अछि। जानि नहि,मैथिली सेवक गण सोझे हुनके किएक ने संपर्क करैत छथि। अनेरे हमरा परिकठ बनबैत छथि। मन कनी विरक्तो भेल मुदा धीरज धयल। कहलियनि:
-बाजू !'
-सर,'जुग-जुग जीवथु' लीखि-लीखि क' रमण सर ओना तं माय मैथिलीक बड़ मौलिक सेवा क' रहल छथिन, मुदा…
ई 'जुग-जुग'...कान मे पड़ितहिं हमरा तँ धरधरी उठि गेल! नहि जानि आब ई की अढ़ौता।खैर।
-कहू प्रयास करब।' हम मिझायले कंठे कहलियनि।
-सर,जुग-जुग संगे, 'मन पड़ैत छथि' वला बात,भोरे-भोरे नहिं देथिन तं शुभ!' फोन पर ओ दयनीय नम्रता सं क'ल जोड़ि क’ कहैत बुझयलाह।
-मुदा ऐ मे आपत्तिये की ?' हम पुछलिअनि।
-सर,भोरे भोरे बरखी-सराध वला बात पढ़ि कऽ आफिसो मे भरि दिन मन कोना दन रहैत छै।'ओ अपन समस्या कहलनि
-आब ई तं अहाँ निजी बात कहैत छी। थिकैक तं ई सामाजिक सूचना ने...। मिथिला समाज बड़का टा छैक।हुनका अवश्ये उपयोगी लगैत हेतनि। तें ने डाक्टर साहेब दैत छथिन।' हम मार्जन करैत,बुझबैत कहलिअनि।
-से तं ठीके। मुदा तथापि। एकोदिष्टो इत्यादि तं अहल भोरे‌ शुरू नहिं ने भ' जाइत छैक?' ।
-तं,अहांक विचार सं 'मन पड़ैत छथि' कखन देबाक चाही?'हमपुछलिअनि।
-दस बजे-एगारह बजे ठीक रहतै सर। तकरा बादे देल करथुन। तावत लोक अपन चाह-ताह पी लेल करत…!' **
     आब एकर कोन जवाब ?            
               गंगेश गुंजन
         (उचितवक्ता डेस्क) 

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