ककरा कहितियै ?

            ककरा कहितियै ?
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गाम सब मे आब दलान सुन्न रहैए।आँगन-आंगन भम पड़ैये ।बेशी आंगन मे एकसर बूढ़ा- बूढी भरि बर्ख जेना तेना दशमी-फगुआक बाट देखैत जीवन खेपि रहल छथि जे दिल्ली-कलकत्ता-मुंबई इत्यादि ठाम सं धिया-पुता औतनि। जनिकर आयल तनिकर भाग्य।ओना कय साल आब कोनो-कोनो किनको परिवार नहियों आयल। तकर अपन क्लेश। 
एहि बर्ख तेहने एक माय-बाप कही कि बाबा-बाबी कही, हुनके घटना कहैत छी। ऐन अष्टमी क' बूढ़ी दुखित पड़ि गेलीह। 
प्रात होइतहि मझिला आंगनक एक टा छोटे देआदिनी हबर- हबर महादेव-दिवारी बनओलनि आ आँचर मे हाथ पोछिते ऐ आँगन पैसैत जेठ देयादनी के बजओलखिन :  
-‘स’खी,स’खी !’ 
सखि उठलीह। देखलखिन तँ एक रती बिस्मितो भेलीह। तैयो बिहुंसबाक चेष्टा करैत कहलखिन-'स’खी ? एतेक  भोरे ?’
-उचिते ने। काल्हि पूजा काल सब रहय। स’खी आहाँ के नहि देखलौं। चिन्ता भेल। शरीर तं ठीक अछि ने ?’  
सखी लागल छनि दुनू मे। दुनू गोटेक बियाह एके शुद्ध मे सौराठ सभा सँ भेल छनि। मधुश्रावणी-कोजगरोक भार सेहो एकहि साल साँठल गेल रहनि।किछुए दिन आगाँ-पाछाँ दुनूक दुरागमनो। बयसे एक बर्ख पैघ मुदा संबंधें छोट छथिन। सासु सब कहलथिन।अपनो मन भेलनि।दुनू गोटे सखी लगा लेलनि। से आइयो ओहिना छनि। जेना गंगा मे पैसि क’ सखी लागल होइन । 
-कहलौं नै,की भेल ?' दोहरा क' पुछलखिन।
-एकाएक बड्ड जड़ैआ ऊठि  गेल। खूब जोर सँ दुलदुली उठल आ तकरा बाद तेहन ज्वर भेल जे एकदम नाचार भ’ क’ ओछाओन पर बेसुध पड़ि रहलियैक।पराभव भ’ गेल। एखन जाड़क ओढ़नो सब तँ नै निकालने छियै ने स’खी। जाय जोग नहि रहलौं तँ एत्तहि सँ भगवतीकेँ गोर लागि लेलिअनि        
-आँगन मे भाय जी रहथिन की नै?’सखी चिंता करैत पुछलखिन।  
-रहबे करथि। संजोग। हिनके कहलिऐन-कोनो बिछाओने ओढ़ा दीय'। देह पर तोसके ओढ़ा देलनि।’ दुखताहि हँसैत बूढ़ी कहलखिन।
 -आ,फेर भायक जलखै-चाह कोना भेलनि ?(भाय मानें भैंसूर)'। सखि जिज्ञासा कयलखिन।
-की करितिअनि। रातिक दू टा सोहारी बाचल रहि गेल रहै। भरिसक नोन-तेल संगे...।'
कहिते रहथिन कि बीचहि में  अनुरोध करैत सखि कनी जोरे सं कहलखिन-  
-कहू तँ। एतेक तेहल्ला बना देलौं सखी। एहना मे हमरा किएक ने कहा पठा देलौं ?’ 
-केकरा कहितियै स’खी...?’ बूढ़ी लाचार स्वरमे कहलखिन। 
दुःख सँ पछताइत सखी मने मन अपन जीह कुचलनि- आहा,सखी के हमरा ई नै कहबाक चाहै छलय...एहू दशमी मे कोनो बच्चा नै अयनलिहें। 
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           गंगेश गुंजन

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