गर्मी छुट्टीक दुपहरिया मे बच्चाक मन
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भोरे मम्मी आफिस गेली तकर बाद पप्पा चल गेला। हमरा नहा-धोआ क’ दादी कुर्सी पर बैठा देलनिहें।
दूध मे गूड़ल रोटीक छिपली राखि गेली खाय ले सोझां मे अपने तं क’ रहली पूजा दादा सेहो ओंघा रहलाहए।
कहि गेलीहए बै'स संच-मंच सूति रहू भरि दुपहरिया हमरा निन्न ने लागय तैयो बंदे रहू बहुत छै रौदा
जइतौं देखतौं खोलितौं खिड़की की क’ रहलए पार्कक मैना पुछितौं एहन रौद गर्मी मे बैसल छें खोंता मे केना ?
अबितें संगे लुडो खेलैतौं सांझ मे कत्तहु घूम’ चलितौं कोना आओत ओ तँ मां लग अछि हम्मर मम्मा कखनि आओत ?
जए ने ऊठ’ चाहै छी कि खट द’ टूटि जाइ छै ध्यान केना आंखि बन्दो रहला पर देखैत रहै छै बुढ़ियाक कान ।
जप्प करैए गोर लगैये दादी केना आंखि मुनने ऊठत पूजा क’ क’ कहिया। खाएत कखन सूतत ई बुढ़िया !
🐦🦜🐧। गंगेश गुंजन, रचना: 30 मई, 2011.
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