मनुष्यक बाजब !

मनुष्य,बहुत बाजैए-प्रेम सं ल' घृणा धरि।'मां' सबसं बेसी बजैए जीवन मे। प्रेम तकरा बाद।


गंगेश गुंजन।(उचितवक्ता डेस्क)

टिप्पणियाँ