हमरा जन्तबे

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वयस मे छोट-पैघ तं हम मानैत छी,कवि आ लेखक मे नहिं। साहित्य-कला देशक भीतर देश जकाँ होइत अछि तथा जकर सभ लोक समान नागरिक होइत छैक।                  गंगेश गुंजन। (उचितवक्ता डेस्क)

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