ज्ञानक छल !

ज्ञानक छल (प्रपंच) समाजक सभ टा उत्पात ओ अशान्तिक जड़ि थीक।

मनुष्यक ज्ञान जखन निश्छल भ' जाइत छैक तखन सामाजिक समरसता अनेरे आबि जाइत छैक।                         

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       गंगेश गुंजन। (उचित वक्ता डेस्क)


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