नव आलोचना

मटिया तेल सं मोटर भरि सक्के चलय तहिना पुरना बोध आ भाषा सं समकालीन लेखनक समीक्षा सेहो संभव नहिं।          साहित्यक स्वरूप जेना कथ्य सं तेवर धरि मे युगक अनुकूल बदलैत छैक तहिना परिपाटी (पुरना) भाषा आ व्यवहार मे समकालीन कृतिक आलोचना संभव नहिं होइत छैक। सार्थक होयबा लेल आलोचना कें सेहो अपन भाषा ओ तेवर बदलय पड़ैत छैक। साहित्य जकां समालोचना के सेहो आधुनिक होअ' पड़ैत छैक।

गंगेश गुंजन।                            (उचितवक्ता डेस्क)

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