!! करोना-बुलेटिन !!
समाधान प्रसाद जी जैसे मित्र रहें तो करोना क्या, करोना के बाप भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते। मसलन यह कहकर कि ऐसे समय में परस्पर एक-दूसरे के घर चाय- काफी पीने आना-जाना या ईगो से जोड़ कर मित्रता की कसौटी मत माना जाय' की हिदायती सलाह देते हुए आज वह खुद तो नहीं पधारे परंतु आदेश के तेवर में फोन पर
यह ज़रूर फरमाया: " देखिए, लिख-पढ़ कर तो आप लोग तमाम फेसबुक भरते रहते हैं। लेकिन इस आपातकाल में आपसे निवेदन है कि अपने स्तर पर जनहित में आप लोग नियमित एक 'कोरोना बुलेटिन' कोरोना समाचार अवश्य ही दिया करिये। सरकार तो अपने स्तर पर जो कर रही है बेचारी कर ही रही है। हां समय आप अपनी सुविधा से चुन सकते हैं। सुबह दोपहर शाम। वैसे अच्छा तो है कि बुलेटिन त्रिकाल छपे। परंतु सब को समय की सीमा है। सो विकल्प है। सुविधा से जो हो सके जनहित में आपको आप लोगों को करना चाहिए। अब यह फर्मा तो दिया समाधान बाबू ने। पहली नज़र में हंसी-विनोद की बात लग सकती है लेकिन है विनोदी बात है नहीं। आप ही सोचे हैं कितना विकराल समय है यह। आधुनिक धरा धाम के तमाम चक्रवर्त्तियों को भी लोहे के चने चबवा डाला। बेचारा बना करके छोड़ दिया है।' बरहाल।
" जैसे, बुलेटिन कैसा हो?' मैंने जो छूटते ही यह पूछा तो अपने स्वभाव के अनुरूप समाधान बाबू इत्मीनान से बोले:
"जैसे कि मेरे ही टावर में,ठीक बगल के फ्लैट में रहने वाले मेरे पड़ोसी हैं राम सुभद्र बाबू। भेंट हुई तो कल शाम में मैंने उन्हें यह अंतरर्राष्ट्रीय परामर्श दिया था कि जितना संभव हो स्वच्छ रहें,साबुन इत्यादि से बारंबार हाथ धोते रहें। तो उन्होंने ही अभी-अभी टेलीफोन पर चर्चा हुए करते हुए कहा है-
"वह तो ठीक है। लेकिन इतना भी कहीं हाथ धोना होता है साहेब? अब यह हाथ धोने की जैसी रफ़्तार हो गई है इससे तो लगता है कि करोना शायद बख़्श भी दे,हाथ धोते-धोते कहीं जीवन से ही न हाथ धो बैठें हम।'
अब इसका क्या जवाब है ?
*
बहरहाल,सोचना तो चाहिए। विचार सादर आमंत्रित हैं।
आपके अनमोल विचार आते ही "कोरोना समाचार' में उसे सज-धज कर प्रकाशित किया जाएगा।
(उचितवक्ता डेस्क)२०.३.'२०.अपराह्न।
-गंगेश गुंजन
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