जीवन

केहन असीम भविष्यक कतेक पैघ      जीवन घोकचि क’ कतेक छोट नाटक      भ’ क’ कोनहुँ ठाम,कत्तहु समाप्त/        लीन भ’ जाइत छैक ! 

                    गंगेश गुंजन

               [उचितवक्ता डेस्क]

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