🌾🌿 ।। कविता ।। 🌾🌿
सरस्वतीक सभ सन्तान मे कविता सब सं दुलारू आ आवारा निकललनि। कउखन घर मे नै रहैत छनि।एतेक वयस भ' गेलैए किन्तु आइ धरि एक टा घर नहिं बनौलकनि । अपन गृहस्थी नहिं बसा सकलनि। भाइए-बहिन पर निर्भर रहि गेलनि। पहिने तं ओहो लोकनि स्नेह आ ममता संरखलकनि। मुदा अपन-अपन गुण आ विद्या मे भेल गेल ह्रासक संगहिं ओ सब अपनहि गरीबक होइत गेल। हिनका कत' सं खुअबितनि। तं कविता आन आश्रयक खोज मे किछु दिन बौआयल। किनको कतहु राज्याश्रय सेहो भेटि गेलनि।बेसी के कोनो आश्रय नहि। एम्हर सुनैत छी पचास सय बर्ख सं आब कविता सेहो खुर्पी- कोदारि धयलनिहें।
आब देखा चाही जे की होइत छनि प्रारब्ध। कविता खेत-पथार बांचै छथि। सत्येक समाचार थिकै ई की ?अपने लोकनि कें बुझल अछि !
गंगेश गुंजन
# उचितवक्ता डेस्क।
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