साहित्यिक बहलमान
एक समय मे उत्साह मे हम एक टा पैघ प्रगतिशील लेखक कें साहित्यिक बहलमान कहि देने रहिअनि तं ओ हमरा ततबा फझ्झति कयलनि जे आइ एतेक दिन धरि हमरा बिसरल नहिं भेलय। विडंबना तं ई जे हुनका एकर क्रोध रहनि जे हुनका हम सारथी किएक नहि कहलियनि जे बहलमान कहलियनि? रथ आ बैलगाड़ीक हैसियत एक बराबर छैक?' एक तरहें हुनक क्रोध ठीको छलनि कारण जे ताही आस-पास मे एक टा प्रतिष्ठित आलोचक हुनका 'साहित्यक सारथि' कहि विभूषित क' चुकल रहथिन।हम सोचलिऐक जे जनवादी कवि छथि।अबस्से सामंती सारथि कहाएब अप्रिय लागल हेतनि।तें ई सोचि क' जे बुर्जुआ सारथिक बदला सर्वहारा बहलमान कहबनि तं जनवादी बहलमान सुनब हुनका प्रिय लगतनि। मुदा आहि रे बा …बुझू विपत्ति भ' गेल छल
# उचितवक्ता डेस्क।
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