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।। बाल कविता।।
दादा: 'अइंठे हाथे कलम धरै
छी बौआ,नहि नीक
बात।
पोता: नहि छूअब आब हाथ
धोइत छी दादा जी।
दादा: जा: पोथी मे पयर लगैए
बौआ नहिं नीक बात।
पोता: गोर लागि लेलौं नहिं
बिसरब आब दादा जी।
दादा: डंयर घीचै छी फेर देवाल
पर,नै नीक बात।
पोता : मेटा दैत छी।नै घीचब
आब कहियो दादा जी।
दादा: प्रात भेल सूर्य उगि
गेलाह सूतल छी बौआ
नै नीक बात।
पोता: हम तं मुंह झंपने पड़ल
छी-झात दादा जी'
झात !
(३१.८.'१५.)
* पोता-दादा संवाद*
दादा: कत' बजैए घर में
कोइली ?
पोता: कोइली नै दादा जी
ह'म-कू-ऊ ऊ---
दादा: कत' सं मयना घर मे
आयल बाजि रहल
अछि एतेक मधुर ?
पोता: मैना नै दादा जी हम छी
एना (कान में)-कू-कू
दादा : सूगा-मयना कोइली
सबटा आयल एकहि
ठाम कोना
पोता : सब टा हम छी दादा
जी,अहीं के तुतकुन्ना।
दादा: बस्ता खूजल,पिंसिल
खसल,पसरल छैक
पोथी ?
पोता: एखने सरिया लै छी
दादा ई सब छी हमरे
पोथी ।
दादा: काल्हि कोन दिन हेतै
हमरा के कहत ?
पोता: रवि दादाजी,भरि दिन बौआ
अहीं लग रहत।
***
गंगेश गुंजन
#उचित वक्ता
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