ग़ज़ल सन ।
एहि समय मे लोक के,सबंधिको के कहब की । दोस्त सब तं गेल एकेक एकसरे हम कहब की ?
दुःख लोकक सहि न सकलहुँ आइधरि जे आब से अनाचार अन्याय सब से वैह बैसल सहब की ?
बड़ छलय गौरव म’नक ई माटि नहिं ईंटाक थिक। आब जा क’ एना बालुक भीत भ’ क’ ढ’हब की? घटित भइए जाय अनघट लोक-मोनक के कहय दुःख कातर प्राण मिलि हुँकार क’ दय अजब की ! जिन्दगी भरि सहैत रहलौं अपन लोकक दासता। अंतिमो धरि वैह पुरने रासि मे हम ब'हब की ?
हाथ एखनहुँ रिक्त ओहिना गुंजनक से सोच छनि। आब अंतिम डेग पर एहि बाट मे,पिछड़ऽब की ? *****
गंगेश गुंजन
# उचितवक्ता डेस्क।
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