। ग़ज़ल सन ।
एहि समय मे लोक के,सबंधिको के कहब की। दोस्त सब तं गेल एकेक एकसरे हम रहब की। दुःख लोकक सहि न सकलहुँ आइ धरि जे आब से अनाचार अन्याय से सब वैह बैसल सहब की। बड़ छलय म’नक गुमान माटि नहिं ईंटाक ई। आब जाक’ एना बालुक भीत भ’क’ ढ’हब की। घटित भइए जाय अनघट लोक-मोनक के कहय। दुःख कातर प्राण मिलि हुँकार क’ दय अजब की। जिन्दगी भरि सहैत रहलौं अपन लोकक दासता। अंतिमो धरि वैह पुरने रासि मे हम बहब की। हाथ एखनहुँ रिक्त ओहिना सोच गुंजनक छनि। आब अंतिम डेग पर एहि बाट मे पिछड़’ब की। ***** गंगेश गुंजन, २०.०५.’२०.
#उचितवक्ता डेस्क।
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