आसन आ उत्तराधिकार
ककरो सं छीनल आसन-सिंहासन अस्थायी होइत छैक।ओ कहियो टिकाउ नहिं भ' पबैत छैक जखन कि उत्तराधिकार मे भेटल आसन टिकाउ सार्थक संगहि दीर्घायु होइत अछि।
भाषाक विद्यमान स्थिर साहित्य मे नव खाढ़ी लेखक रचनाकारक अभ्युदय तथा प्रवेश सृष्टिक सहज सामान्य व्यवहार ओ प्रक्रिया थिकै। तकर स्वागत होइत छैक। कारण लेखक/रचनाकारक यैह न'व खाढ़ी सब वर्तमानक स्वाभाविक भविष्य होइत छैक। किन्तु वर्तमान कें अपदस्थ ओ छीन क' ल' बढ़ि जाइ वला कोनो अधीर नव पीढ़ीक भविष्य टिकाउ,स्वस्थ ओ सुन्दर कथमपि नहिं भ' सकैए।
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
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