अनन्त भेटताह ?

               अनन्त भेटताह ?

                        **                                    हमरे थिक ओ मात्सर्य-अर्जक मुरूत।

हमरे,हमर स्त्रीक ममताक चूर्ण द्रवित हृदयक

अवयव-ढेरीक पुनर्रचनाक प्रक्रिया थिक।

खण्ड-पखण्ड भावत्वक ध्वस्त काया,माया-

सीरा आ ध'र दू कात छर-छर शोनितक फुचुक्का मे,भूमि पर जाहि घड़ी बलिप्रदानक छागर भेल छल -ओ समस्त मनस्तत्व भेल छल चूर-चूर,

धूरा गर्दा।

तं ओकरे ढेरी पर ठाढ़ भ’ क’ दुनू गोटय-

माने, हम आ हमर स्त्री,माने एकटा पिता आ माय,

चूर कें अपने दु:ख आ नोर सं सानि-सानि,बना लेने रही कोनो दुर्गा गणेश मूरूतक माटि।

बड़ मनोयोग सं गढ़ने रही ओहि माटिक मुरूत कें,

बैसल-बैसल ।

हम दुनू गोटय दुनू गोटय भ’ गेल रही ओही मे।

सोझांक,पएर तरक,आ मन महक सभटा ममताहत क्लेश कें,उपछि-उपछि क’ जीवन सं बाहर करैत

बड़ी काल अनुभवैैत रहि गेल रही अपस्यांत।

तथापि बना राखय संघात कें मुरूत,लागल रही। लगातार लागल रही,

केहन पागल रही ?

*

अपनहि दर्पाहत अस्तित्वक तौला सं खसि पड़ल

सबटा सुक्खा प्रसाद कें समेटि क’ बैसि गेल रही 

माटि जकां बनाबय फेर सं-मुरूत।

बुकनी-बुकनी क’ देल गेल मन-प्राण-संवेदना कें समटैत,सानैत आ फेर गढ़ैत काल केहन भ’ गेल रही तखन असकर-असहाय ।

आ आब आइ ?

अपनहि ध्वस्त ममताक मुरूत रचि क’ सोझां मे रखने,केहन छी निर्द्वन्द्व,निश्चिन्त,दुःख-मुक्त !

‌फेर उताहुल करवा लय नव मूर्त्तिक प्राण प्रतिष्ठा !

स्त्रीक रिक्त कोरा कें नवजात शिशु सं भरै लय 

थर-थर देह-प्रयोग मे निसर्ग-ऊर्जा व्याकुल !

। गंगेश गुंजन। 

रचना : अनुमानत:२००७. ई.

कंचनजंगा,से.५३,नोएडा।

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