हाथ हाथक काज।
हाथो मनुष्यक बेस अंग अछि।
कलम,कोदारि,तरुआरि,करुआरि
सब यैह, हाथे धरैये मुदा,
परिणाम ओ अपना इच्छा सं नहिं,
अहां मोताबिक दैए।
आज्ञाकारी हो तं एहन!
यैह हाथ सब सं बेसी पसिन्न छैक
राजनीति कें।
देश-दुनियां भरि कें यैह चाही।
जीवन जीयै लेल ई सभ कहां धरि,
कतेक छैक अनिवार्य से
यदि हाथ के बूझल रहितैक !
सैह विडम्बना !
अपनो देहक दासे बनल रहैए
हरि जीवन हाथ,जकरा
केहन सुन्दर प्रेम करय अबैत छैक आ प्रेम-पत्र लीख'।*
*गंगेश गुंजन।०१.११.'२०. #उचितवक्ताडेस्क
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