स्वप्न रक्षा !

विकाल राति रहय फेर राति।                          चेतल रही आंखि मुनने अपन सुरक्षा मे।

राति मे बेसी काल आंखि मुनने रहल नहिं जा सकैए। एतय धरि जे सुरक्षार्थे ने किएक।

लोक स्वप्न मे चलि जाइए।चलि की,कूदि जाइए। 

सभ समाज,राजनीति, संस्कृतिक धारणा कें  प्रतिरोध पूर्वक लत खुर्दनि करैत चलय लगैए अनमन जेना खूर सं करैये बड़द धानक पाकल सुखायल शीशक दाउन निकालै वास्ते धान ।

स्वप्नक सभटा मौसिम मनोनुकूले नहिं होइत छैक।

से हमरो रहय विपत्तिक अन्हार गर्म राति।

अकस्मात् सपना पर मधुश्रावणीक बसात बह' लागल। निन्न तेहन झोंकलक जे ओहि मादक बसात मे अपनो स्वप्न उधिया गेल !

ई घटना तेसर बेर छल।

जखन कि मधुश्रावणी जीवन मे एक बेर मात्र भेल।

तखन ई दोसरे नहिं,तेसर ? किएक? 

किछु तं छैक। 

आब कल्पनाक आंगन सं बेदखल करबाक एहि षड्यंत्र के चीन्हि गेलिऐकय।

बुझि गेलिऐकय जे ई बसात हमर स्वप्ने उधिया ल' क' चलि जाइए।

तें ऐ बसात सं सपना के बचौने जा रहल छी।

जा कि आबि रहल छी।

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गंगेश गुंजन।

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