🌸आब स्वेटर नहिं बीनै छथि स्त्री 🌸
आब स्वेटर नहिं बीनै छथि स्त्री।
एकाएक नहिं,एम्हर आब लगातारे
स्वेटर नहिं बीनै छथि स्त्रीगण।
स्वेटर नहिं बीनब अब कतहु एहि बीचे
स्त्री सशक्तीकरण पर्याय तं ने भ' गेलै।
चरखा-टकुरी काटब क्रमेण छुटलनि तं
कुमारि कन्या,नव कनियांक कोमल हाथ मे कुरूस कांटा आबि गेलनि। ओइ कल्पना स्नेही मन संगे
कतोक दिन गीत गबैत जकां बीति गेलनि।
ओ कल्पना स्नेही मन,सब वर्ष जड़काला मे
नव चलनिक पैटन मे बीनि क' आप्त कें अपने हाथ सं स्वेटर पहिरयबाक आतुरता मेहाय लगलनि।
फेर जल्दीए मौला गेल।
नव-नव पैटन सिखबाक स्पृहा नहिं रहय लगलनि
किनको।
पहिले बेर बनलि माय आ नवका ओझाक सारि कें छोड़ि जे फुदना वला लाल-पीयर टोपी आ भरिबहियां स्वेटर बीनय मे बिता लैत छलीह अबैया बच्चाक स्वेटर बिनैतअपन कठिन कष्टक पूरा गर्भ काल।
जराउर मे नवका ओझा कें सांठि क' पठयबा लेल स्वेटर सस्नेह,प्रिय सारि।
परीक्षाक तैयारी जकां भरि टोल ननदि नवकी भाउजिक दरबार मे लागल रहैत छलीह।
स्वेटरक नवका पैटन सीखैक स्पर्धा पसरल रहैत छलय। वर-दियर वास्ते जाड़ मे हाथ सं बीनल नव पैटनक रंग-विरंगक उपहार देबाक मनोरथ,गामक इनारे-पोखरि जकां सुखाय लगलनि।आब तं निठ्ठाहे सुखा गेल बुझाइए।
आब एखन तं एक सं एक मेंहीं सुन्नर डिजाइनक रंग-बिरंगक स्वेटर सं पाटल अछि बजार।
मधबन्नी सं मद्रास।
ओतहि सं कीनि क' आन' लगलीहय स्त्री।
तर्क ई जे कीनलो तं आखिर बीनले स्वेटर जाइए ने।
यद्यपि तहिये जकां आइयो लोकक बड़ विशाल
वर्ग अछिए स्वेटर बीनैक मनोरथ सं वंचित।
ने बजार योग एखनहुं।
*
हमरा मन पड़ैए पटना आर.ब्लाक !
१९५७ ई।.सरकारी आवासक कालोनी।
कालोनी मे चौबाटी सं ढुकिते सड़क दहिना कात
पुलिस लाइन रहैक। लम्बा एक कोठलिया घर। एक दिन ओहि बड़का नमछोर बरण्डा मे जौरीक घोरल खाट पर बैसल एक टा युवक सिपाही कें बड़ मनोयोग सं दुनू हाथें खट-खट किछु करैत देखि उत्सुक भ' देख' लगलिऐ की क' रहल छैक ई?
पुरुषक हाथ मे प्रथमहि बेर ऊन-कांटा देखि क' आश्चर्य लज्जित भ' गेल रही हमहूं।
गछैत छी।
एहि भाव मे डेरा पहुंचैत धरि,
मन व्याकुले भेल रहल-
'पुरुख भ' क' स्वेटर बीनि रहलय ?'
मुदा हं, इमानदारीक बात,
अपनहु सेहन्ता भेल रहय-स्वेटर बीनब सीखितहुं।
दुपहरिया मे भैया लय नव स्वेटर बीनैत देखलिअनि भौजी कें।
'हमरो सिखा देब' भौजी ?' धखाइते-धखाइत कहलियनि।
'कथी सिखा दिय ?' नजरि उपर उठा क' भौजी पुछलनि।
'स्वेटर बीनब।' हम लजाइते कहलियनि।
'छिया-छिया पुरुख कतहु स्वेटर बीनय? लोक हंसत बाबू साहेब।' हमरा देखैत भौजीओ एक रती हंसलीह।
मुदा हमरा बहुत वेग मे सेहन्ता भेल रहय
ककरो लय हमहूं बीनितौं स्वेटर।
ककरा लय ?
तहिया से रहल रहितय तं हमहूं सीखिए गेल रहितहुं
ऊन-कांटाक ई उन्मत्त कला।
ई कोनो पुरुष प्रथा रहैक कि प्रेमक प्रकाश,
सोचैत छी ।
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गंगेश गुंजन।११.१२.'२०.
#उचितवक्ताडेस्क।
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