चुगिला साहित्य पर बहस।

   चुगिला साहित्य पर बहस।

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'खाली चुगलपनी पर कोनो साहित्य भेटत ?'

'पूछै छी-कोनो? मैथिलीक तं समस्त साहित्ये चुगलपनीक साहित्य अछि।'साहित्यक  दोसर सज्जन छुटितहिं कहलथिन। 

'औ,हम साहित्यकार द' नहिं पुछलौं। साहित्य द' जानय वास्ते पुछलौं ।' प्रश्न कयनहार सज्जन एक रती खौंझाइत कहलथिन।

    तेसर लोक कोनो परम सात्त्विक कवि रहथि। क्रोधे कांप' लगलाह। मार-मार क' उठलाह। बजलाह :

'केहन अपात्र छी अहां लोकनि यौ?कहू तं। एक्कहि करुछे सभ पूर्वजहुं महान् साहित्यकारो कें लाड़ि देलिअनि।' तड़गंलथिन।

'अपने सेहो लेखक छियै की ?' दोसर गोटय अपना बयसक विरुद्ध परम शान्त स्वर मे जिज्ञासा कयलथिन। जिज्ञासा सं ओ अपमानित भेल बुझयलाह। देखलथिन आ अपना बगली सं पुरान मोचड़-तोचड़ल कोनो पुस्तिका निकालैत कहलथिन-'...हमर कविता घर-बाहर सदृश पत्र में पर्यंत छपि चुकल अछि।अहां लोकनि कें ज्ञात नहिं अछि। पढ़ियौ तं ई अहां के चुगिला कविता लगैए ?' ओ 'घर-बाहर' पत्रिकाक कोनो पुरना संस्करणक अंक हाथ सं फहरबैत गर्व सं कहलथिन।

दोसर सज्जन कनिक अओर सज्जन होइत क'ल जोड़ि के कह' लगलथिन:

'नै-नै। ने अपने त्रिपुण्ड नहि ने केने छियै।ने लाल ठोप कयने छी। ने गर्दनि मे यात्री जी जकां गमछे देखायल। एत' धरि जे गुंजन जी जकां कान्ह पर झोरीओ नहिं देखलौं तें देखि क' अपने कें चीन्हि नै सकलौं जे कवि छियै अपने।'                             आब एकर कोन जवाब ।

                     गंगेश गुंजन

                #उचितवक्ताडेस्क।


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