। धरतीक विशाल ढाकी मे राखल ।
हमर मन हरियर झमटगर पैघ गाछ अछि। अबिते रहैए चिड़ै चुनमुन्नी कोनो डारि, दोग-दाग मे फुदकि क' बैसि जाइए। चिन-चुन चुन अनघोल सं अनचोखे गुदगुद्दी लगा दैए। झहर' लगैए हमर देह सं पातक मृदु हरिअर ध्वनि।
जानि ने कखन,ओ,हमर देह मे मज्जर भ'शब्द जकां फ'रि जाइए। अर्थ-अभिप्राय जकां डम्हाइए आ पाकि-पाकि भूमि पर खसय लगैए। जहिना खसय लगैए कि हाथ मे लोकि क' आतुर भ' हम कोनो बासन तकैत-छितनी,पथिया,ढाकी मे धरैत जाइ छी। अपना मने कविता,कथा नाटक उपन्यास लिखैत जाइ छी। यदि सेहो तं ई देह-वृक्षे थिक से आलय जे,ख़ुद अपने मनुक्ख तनक एक विशेष फ'र थीक। से तन मायक। माए समस्त सृजनक माय थिकीह ? माए ये फरलीह हमरा।
हम अपन जननीए-जनकक एक गोट कविता छी।विस्तृत विशाल धरतीक ढाकी मे ध' देलनि आ चलि गेलीह।
आब तं हम कोनो पुस्तकालये मे राखल भेटी।असंख्य पोथीक रैकक कोनो खाना में। ओतक हाजरी बही मे माय समय-समय पर टोकैत,किछु आवश्यक पूछैत भेटतीह जरूर।
कथमपि ने कहतीह कहियो- 'आब तोहर दसखत नै मिलै छ'। अक्षर लीखैत हाथ थरथराइ छ'!
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गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
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