फेसबुक दलान

🌳🌳          फेसबुक दलान  !

   सूति-उठि क' भोरे लोक जेना,
   दलान पर अबैए,
   हम फेसबुक पर अबैत छी।
   बैसल संगतुरिया,जेठ-श्रेष्ठ सं
   टोल भरि गामक गपशप करैत छी।
   देश-दुनियाक नीक-बेजाय
   अमेरिका सं ल' चीन भरि दुनिया
   पॉलिटिक्सक बसात मे बहैत छी तँ
   कोनो बेजाय करैत छी !
          *    ...एक टा रहथि भुसकुलिया !
   नामी रहय हुनक पिक्की !
   लोकक जीवन सं वनवास चलि गेल
   हंसी-ठठ्ठा! ,
   आब झुठ्ठा प्रपंचीक लोकक भेद खोलि क'
   राखि  दै वला सोझाँ सोझीक नवतुरियाक ओ
   पिहकारी सेहो नहिं बाँचल।
   अनर्गलक उपहास कें देखार क' दैत छलय
   ठाँहि पठाहिं। सैह,
   भरि गौंआक एकसंगी पिहकारी घुरा आन'
   चाहैत छी।
   एकसर विपत्ति मे पड़ि गेल गामक
  भुसकुलियाक ओही एक टा पिक्की केर
  खिस्सा सुनब' चाहैत छी,  दूरस्थ बाध डीह पर
  रखबारी करैत काल ओइ भयावह घोर
  अन्हरिया राति मे लगौने रहथि जे पिक्की।
  जखन हुनका राकस सब घेरि लेने रहनि
  आबि क'
  आ एकसरे अपना कें बचबैत,लाठी भांजैत ओ 
  गौंआँ के जे पीक देने रहथि जे पीक-
  मेघ कें छूअइत,सुतली राति मे उठा क' भरि
  गांँव के जगा देने रहैक आबि क'।
  भुसकुलियाक से पीक सुनि क' धराधर पहुंँचि
  गेल रहय सौंसे गाम ओहन विकराल डेराओन
  राति मे भुसकुलिया लग !
  विद्या वैभव,गाम गौरवक खिस्सा मे
  भुसकुलियाक से इतिहासिक पिक्की मिझा क'
  हेरा गेल अछि आब। एकक विपत्ति में कोना
  भरि गांँव ठाढ़ भ' जाइक से पिक्की !
  तकरो वर्णन कर' चाहैत छी।मुदा प्रबुद्ध जन
  बेर-बेर चेतबैत छथि हमरा-
  'एहि फेसबुक सन निछच्छ आभासी समाज मे
  व्यर्थ थीक एहन कोनो सामाजिक चिन्ता आ
  व्यवहार।
       विचार आब से नहिं रहि गेलय विचार।'
                       *
   हमर कहब अछि जे कालक दोखें
   जे पुरना दलान आब नहिं रहल,
   एकरो ओहने नव प्रसंगिक नै बना सकैत छी।
   हम तँ बाबू, ताही हृदय सँ एत'
          फेसबुक दलान पर अबैत छी।
                           **
                      गंगेश गुंजन

                  #उचितवक्ताडेस्क।

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