ग़ज़लनुमा
कहने लगता मैं भी वैसा चलता है बज़ार में जैसा
पर अफ़सोस कहूँ अब किससे जी जाँ पर बन्धन है कैसा
किसने क़सम दिलाई थी कब तोड़ूँ कैसे दिया भरोसा
कभी-कभी लगता ज़रूर है ऐसी क्या जिद ये क्या ठस्सा।
होने से दूकान बचा क्या रिश्ता नाता भी इक जैसा
कम न तिजारत यहाँ सियासत अब कवियों का भी अपना-सा।
उन ने चुना उधर ही रस्ता इक गुंजन ख़ुद्दार खड़ा-सा।
गंगेश गुंजन।१३.३.'२१
#उचितवक्ताडेस्क।
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