डराएल कविताक मादे

🌒 !!!

    काल सँ कविता भयभीत भेल तखन तंँ
    भ' गेल !
    भय स्वाभाविक भ' सकैए किन्तु कविक   
    भयभीत होएब शुभ लक्षणि नहिं।
    विशेष क' कोनो कवयित्रीक। मैथिली मे
    डराएल कविता पढ़ि क' हम चिन्तित छी।
    स्त्री एहि दुआरे कहलौंहें जे जनिक कोरा में
    संहार खेलाइत छैक स्वयं से सृष्टि कोना डरा
    जयतीह ?        

                        गंगेश गुंजन
                    #उचितवक्ताडेस्क।

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