अशुभ शोक का बोध


             । अशुभ शोक का बोध।

जब मेरी शुभकामनाओं में दम नहीं रहा,उल्टे छोड़े ही चले जा रहे हैं मेरे लोग तो ऐसा जर्जर हृदय और ऐसी निस्तेज शुभकामनाएँ रख-कह कर क्या होगा ? अपने कम वय साथियों को भी नमन विदाई-पुष्पाँजली देते-देते अब चित्त विचलित और असहाय हो गया है। अशुभ थकान अर्थी ढोने जैसा अनुभव है।

      विकट कोरोना-काल में इस अनुभव से लाचार हो कर मैंने विचारा और इस फेसबुक पर फिलहाल मैं अस्वस्थ्य आत्मीय जनों को अपनी शुभकामनाएँ देना स्थगित कर रहा हूँ। 

देह में प्राण हैं तबतक समय से असंपृक्त तो नहीं रह सकते। लेकिन लौटूंगा तभी जब मेरे आशीर्वाद में आशीर्वाद फिर आ जाएगा। 

     क्षमा करिये और दुआ कि मेरी मेरी हताशा जल्दी छूटे साथियो !

#गंगेश गुंजन। २१.०४.'२१.पा.टि-८.

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