।🛖।
-एक-
अपन दोस्त संँ अपने हम बदला कोना लीतहुँ
बिसरि गेल हमरा तकरा बिसरि कोना जैतहुँ।
-दू-
बहुत रास बाकस राखल सब बन्द घ'र,
खाली छैक।
धन विहीन रहि कऽ जीबा मे अलगे खुशहाली
छैक।
-तीन-
किनको सँ राग नहिं अछि ककरो सँ द्वेष
नहिं अछि।
अपने संँ मन कुपित अछि आ परजरित
रहैत अछि।
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गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
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