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स्मृति
नापर्वाही मे ओइ ठाम हमर
एक टुकड़ी स्मृति खसि पड़ल तंँ
हम ओइ पर पात लागले गमकैत टटका
चम्पा फूलक एक टा घरुछा राखि क' चलि
अयलौं।
इच्छा ओइ पर गाछ रोपि देबाक रहय मुदा
सोचि क' नै रोपलिऐ-
के पटओतै,देखतैक। तथापि जेना-जेना पैघ
होइत जयतैक,भूमि पर अओर पसरैत जयतै,
प्रयोजन हीन फूल गाछक के करतै
रखबारी ?
डेग दैत काल अनचोखे फूल पर ककरो
पयर पड़ि जाइक तँ उठा क' कपार पर
लगा लैत छैक से पृथक।
निर्माल तंँ रौद-बसात में रहैत मउला-सुखा
क' अनेरो माटि मे मिलि जाइत छैक।
तथापि फूल परसँ हरिअर पात नहिं हटा भेल।
नहिं योगा हो तँ स्मृति,
निर्माल्ये क' दी।
*
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
१९.०३'२१.
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