किछु हएब

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               'किछु हएब'
    बसात संगे जेना सन-सन शब्दो
    आएल
    पानि संगे तहिना कल-कल
    ध्वनि,स्पर्श।
    चिड़ै चुनमुन्नी संगे चहकब,
    चिन-चिन-चुन-चुन।
    आगि संगे ताप आ सूर्य   
    चन्द्रमा-तारा संगे दिन-राति,
    इजोत आयल।
    उर्वर माटि संगे समस्त वनस्पति
    गाछ-बृच्छ, प्राणि मात्र आयल !
    किछु अबैए तंँ छुच्छे हाथे नहिं,
    किछु सनेस ल'क'। जेना,
    भाषा शब्द,अर्थ-अभिप्राय ल'
    क' अबैए। कविता तहिना कोनो
    करुणा,कोनो आनन्द,कोनो
    विचार-बात,
    कोनो ज्ञान-विज्ञान ल' क'
    आओत।
    अपन-अपन और्दा ल' क' अबैए
    सभ कविता जेना,पोखरि-
    इनार,नदी-पहाड़,निर्झर।
    कविता आ माटि-धरतीक बयस
    बेसी छैक। जत' छाहरि नहिं रौदे
    रौद,ताहू माटि पर रहत कविता।
    कि तंँ धरती पर रहत-बहत कि,
    मेघ सँ झहरत पहाड़ सँ नचैत- 
    कूदैत रहत।
    कविता माटि पानि बिनु नहिं रहि
    सकैए।एहि अर्थ मे कविताक
    स्वभाव बड़ स्वच्छंद आ बजन्ता
    छैक।
    ओकर बाजब रोकल जाइत
    छैक तँ कोशीक बाढ़िक भाषा
    बाज' लगैए।
    हालहि अतीत उन्नैस सय चौंतीस
    ईस्वीक उच्च स्वर भुवकम्प मे
    बाजल रहय।
    अनमन कोनो महाराज जकाँ
    अछि कविता।
    हयत तंँ आदेश भ'क'आदेशपाल
    भ' क' कथमपि नहिं। तें
    बहुत स्वल्पे कविता कविता
   भेटत। बेसी आदेशपाल कविता
   भेटत।
   सत्ता कें सदैव आदेशपाल पसिन्न
   छैक।
   माटि कें अपन उस्सर रहब
   कखनो सहल नहि जाइत छैक।
   जत' उस्सर अछि से ओकर
   पसिन्न नहिं,नियति थिकै।
   कवि केँ बौक नहिं रहल होइ
   छैक।ओकर मरब तंँ अवश्यंभावी
   कविताक नहिं।
   कविता नियतिबद्ध,
   खुट्टा मे बान्हल मरखाह
   नाथल बड़द मात्र थीक।
                            🌿 🕊️ 🌿
                            गंगेश गुंजन,
                   #उचितवक्ताडेस्क।                                           ३०.०६.'२१.

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