कवि नारायण जी कें
सम्बोधित ई कविता
|| खुट्टी ||
फसिल-फसिलक अपन खुट्टी
होइत छैक। आ खुट्टी-खुट्टीक
अपन प्रकृति होइत छैक।
धानक खुट्टी हऽर-फार सँ उपड़ि
क' अगिला फसिलक जोत-चौकी
दैत काल खेतेक माटि मे मीलि क'
खाद भ' जाइत अछि।
राहड़िक खुट्टी खुर्पी-कोदारि सँ
टोका क' जारनि बनि जाइ-ए,
कय काल अपनहिं दालिक दाना
केँ सिझयबाक आगिक आँच,
चूल्हिक जारनि बनि जाइत अछि
आख़िर काल।
कुसियारक खुट्टी कें देखियौ !
अगिला बेर पनुगि क' अपनहिं
पेंपी सँ फेर,कुसियार भ' जाइए।
कय टा बेगर्ताक पूर होयबाक
भरोसक भविष्य हयत-
गृहस्थक ई नगदी फसिल !
बाध मे भुखायल किछु बकरी
बाल-चरवाह,महिंसवारक चोरा-
नुका क' प्रेम सँ चोभा-चोभा कऽ
कुसियार सिठ्ठी बनैत रहैए,से
फराक आ मध्य रात्रिक गीदड़क
गीत।
गृहस्थक नगदी फसिल।
*
जिनगीक छोट-पैघ विफलता आ
निराशा सेहो चेतना पर खुट्टिए
होइअय।
तेहन भेल अपन खुट्टी-जीवनक
परिणाम के मनुष्य कोन फसिलक
खुट्टी बन' दैए -धान कि राहड़ि कि
कुसियार से,ओकर अपने हाथ मे
छैक।
*
लोकतंत्री शासन व्यवस्थाक
जन-मानस बहुत किछु एही तीनू
प्रकारक होइत अछि।
राजनीति मे हम,
कुसियारेक खुट्टी होबऽ चाहैत
छी।
बेर-बख़त साँप मारबाक लाठी
रहय।
*
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
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