अन्हार मे डमरूक प्रभाव: समीक्षा।

।।     अन्‍हारमे डमरूक प्रभाव    ।।
              देवशंकर नवीन 
                         
कतेक बर्ख'क बाद वरिष्ठ कवि गंगेश गुंजनक कविता-संग्रह 'अन्हारमे डमरू' प्रकाशि‍त भेल अछि‍। वर्तमान समाज आ समयक क्रूर यथार्थ‍क संग ई संग्रह नवागत रचनात्‍मकता लेल मूल्‍यवान आ प्रेरणास्‍पद अछि‍‍। अन्‍हार गुज्‍ज वातावरणमे, जीवन-मूल्‍यसँ नि‍रपेक्ष नि‍सभेर नीनमे सूतल समुदाय लेल‍; क्षणि‍क आवेग आ तात्‍कालि‍क लाभक सम्‍पूर्ति‍मे अपस्‍याँत लोक लेल‍; गुंजन जीक डमरू बजाएब अरुचि‍कर हेबे करतनि‍! आलस्‍य, नि‍श्‍चेष्‍टा आ नीति‍-वि‍वेकसँ वि‍रक्‍ति‍ जि‍नकर वृत्ति‍ बनि‍ जाए, हुनकामे चेतनाक संचार लेल कोनो उद्यम सरि‍पहुँ अप्रीति‍कर हएत‍! मुदा जागति‍क नि‍श्‍चेष्‍टा समाप्‍त करबा लेल त' कवि-समाज डमरू बजबि‍ते रहै छथि‍‍‍!...ओ त' दुखि‍या दास कबीर होइ छथि‍! अन्‍धकार-मुक्‍तिक कामनासँ हरदम भरल रहै छथि‍। आजुक पर्यवस्‍थि‍ति‍मे अन्‍धकार- मुक्‍ति लेल चूँकि इजोत पर्याप्‍त नइँ अछि; नि‍फि‍कीर समाज लेल इजोतो अन्‍हारे जकाँ होइत अछि; कम सँ कम गंगेश गुंजन सएह देखलनि‍; हुनका अन्‍हारमे डमरूक डि‍गडि‍गि‍या बजाएब उपयुक्‍त लगलनि‍। कैक दशक पूर्व प्रेमचन्‍द कहि‍ गेलाह जे मनुक्‍खक संवेदना ततेक भोथ भ' गेल अछि‍, जे सामान्‍य गुदगुदी ओकरा सचेत नइँ क' पबै'ए; ओकरा जगबै लेल गहींर नोछार चाही। गुंजनजी अइ नोछार'क  उद्योग 'अन्‍हारमे डमरू' बजबैत केलनि‍ अछि‍।
अइ पोथीक आवरण मदुला सि‍न्‍हा'क पेण्‍टिंगसँ बनाओल गेल अछि‍, जे अइ'मे संकलि‍त कवि‍ता लेल गहन अनुशीलन दृष्‍टि‍ दैत अछि‍। एतए अन्‍हार गुज्‍ज पृष्‍ठभूमि‍कें फाड़ि‍कए धवल- उज्‍ज्‍वल रंगमे एकटा छि‍न्‍नसि‍र कमासुत'क घूँसा उसाहल अछि। आकृति‍क दुन्‍नू हाथकें बान्‍हि‍ रखबाक पुरजोर प्रयास कएल गेल अछि‍; तथापि‍ मुट्ठी उसाहल अछि‍। घटाटोप अन्‍हार'क विरुद्ध इजोत देखएबाक आग्रहसँ ई आवरण अइ संग्रहक कवि‍ताक अर्थ-ध्‍वनि‍कें उजागर करैत अछि‍।
कवि गंगेश गुंजन पछि‍ला सात दशकसँ कवि‍ताक अलावा कथा, उपन्यास, नाटक, चिन्‍तन...स'ब विधामे क्रि‍याशील रहिकए‍ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक कोषकें समृद्ध केलनि‍ अछि‍। मुदा काव्‍यानुरा्ग हुनकर भाषाक जीवन-संगी जकाँ छनि‍। पाठक लोकनि‍ ग'र करताह जे ओ अपन गद्यहुमे काव्‍यधर्मी अर्थ- गर्भि‍तासँ नि‍र्लि‍प्‍त नइँ रहि‍ पबै छथि‍। छठम-सातम दशक'क साहि‍त्‍य लेल प्राय: एहन बहुअर्थी कौशल उपादेय भ' गेल छल; ओहि‍ काल'क कतोक गद्यमे ई वि‍लक्षणता ताकल जा सकै'ए; राजकमल चौधरी आ हीरानन्‍द सच्‍चि‍दानन्‍द वात्‍स्‍यायन अज्ञेयमे त' ई वैशि‍ष्‍ट्य भरल छलनि‍। अज्ञेय ओहुना गंगेश गुंजन'क प्रि‍य रचनाकार छथि‍न्‍ह आ हुनकर रचनात्‍मकता पर अज्ञेय'क प्रभूत प्रभाव छनि‍। सामाजिक सरोकार, मानवीयता,जीवन-मूल्य,दायित्व- बोध,काव्य-विवेकक प्रति‍ अनुराग...हुनकर सम्‍पूर्ण रचनात्मक उद्यमक अनुषंग छनि‍। विषय आ कथन-भंगि‍माक वैवि‍ध्‍य हुनकर अइ संग्रहक वि‍शि‍ष्‍ट गुण छनि‍‍। काव्‍य-सृजन आ जीवन- संघर्षक सुदीर्घ अनुभवमे हुनकर सामना अनेक दुर्वह परि‍स्‍थि‍ति‍सँ भेलनि‍, मुदा अपन सुदृढ़ मान्‍यता, सुगठि‍त जीवन-दृष्‍टि‍सँ टस्‍स सँ मस्‍स नइँ भेलाह। ग्राम्‍य-बोध आ सांस्‍कृति‍क नि‍जताक प्रति‍ हुनकर अनुराग सर्वदा ओहि‍नाक ओहि‍ना रहल‍।
आजीवि‍का लेल दि‍ल्‍लीक महानगरीय परि‍वेशमे अएलाक बाद हुनकर साक्षात्‍कार कि‍छु वि‍चि‍त्र अनुभव-खण्‍डसँ सेहो भेलनि‍,जतए ओ एकसँ एक उदारता,नि‍ष्‍ठा,सदाशयता आ ईमानदारी देखलनि‍; छद्म, स्‍वार्थपरता,क्रूरता,उद्दण्‍डता आ नि‍र्दयता सेहो कम नइँ देखलनि‍। एहनो नइँ छल जे अइ अनुभवसँ ओ पहि‍ने 'अबोध' छलाह, मुदा तथ्‍य थि‍क जे महानगरीय परि‍वेशमे अएलाक बाद हुनकर ई अनुभव दृढ़ भेलनि‍ जे आजुक समयमे उदग्र अधि‍कार-बोध आ अवनत कर्तव्‍य-बोध'क प्रति‍ लोक बेसी ताल ठोकि‍ रहल अछि‍। ई वातावरण हुनकर कवि‍-चि‍न्‍ताकें छुबुधि‍मे अवश्‍य देलकनि। आधुनि‍कताक बि‍हाड़ि‍मे अइ तरहें उधि‍आइत बेचैन वि‍वेक हुनका कहि‍ओ नइँ सोहेलनि‍। 'दि‍ल्‍ली नगर बसमे तामस' आ 'दि‍ल्‍लीमे लाल कनैल'‍ कवि‍तामे भावक चाहथि‍ त' गंगेश गुंजनक ओहि‍ मानवताकें हँसोथि‍ सकै छथि‍, जतए समस्‍त आफद-बि‍पदसँ जीवन-मूल्‍य आ सम्‍बन्‍ध-मूल्‍यकें बचएबा लेल ओ व्‍याकुल देखाइ छथि‍।
अइ संग्रहक एकासी गोट कवि‍तामे वि‍षयगत वैवि‍ध्‍य भरल अछि‍। मूल्‍य-रक्षा अइ समस्‍त कवि‍ताक मूल-भाव अछि‍। बिम्‍ब-प्रतीक-रूपक नि‍र्मि‍ति‍क नि‍जता गुंजनजीक कवि‍तामे विलक्षण रहै छनि‍।अही वैशि‍ष्‍ट्यक कारण ओ अपन समवर्ती कवि‍गणसँ भि‍न्‍न प्रतीत होइत रहै छथि‍‍। भाषाक सहजता आ प्रयुक्‍ति‍क देशजपन ततबा सम्‍बद्ध रहै छनि‍ जे नि‍जता आ नवताक अछैत संवादधर्मिता आ सम्‍प्रेषणीयता कतहु बाधि‍त नइँ होइत अछि‍।
अपन आचारपरक शालीनताक अनुकूले गंगेश गुंजन अपन कवितहुमे पर्याप्त शालीन रहै छथि। उखाड़-पछाड़, मार-काट, नारेबाजीबला भाषाक उपयोग ओ ने कहि‍यो अपन जीवनमे केलनि‍, ने कवि‍तामे करै छथि‍।अत्‍यन्‍त पवित्र, प्रभावी आ सम्मोहककथन-भंगि‍मा  हुनकर अभि‍व्‍यक्‍ति‍क प्राण-तत्त्‍व होइत अछि‍; मुदा तें कि‍नकहु अइ भ्रममे नइँ रहबाक चाहिअनि‍ जे हुनकर कविता कोमल पुष्‍प- पंखुरीक सेज थि‍क। कोमल शब्‍दसँ तीक्ष्ण प्रहारक कौशल सि‍खबा लेल हि‍नकर कवि‍ताक वेधक प्रहार कखनहुँ अजमाओल जा सकैत अछि‍‍। आत्मधिक्कारहुमे हि‍नकर कविता चारू भर इजोत भरि‍ दैत अछि‍।
अइ संग्रहक पहि‍ले कविता 'आब स्वेटर कहाँ बीनै छथि स्त्रीगण'क शीर्षकसँ कि‍नकहु भ्रम भ' जा सकै छनि‍,जे स्‍त्रीक नामे नि‍बद्ध अइ प्रथामे स्‍त्रीकें कमतर देखाओल गेल अछि‍,मुदा से उद्भावना कवि‍ताक अन्‍ति‍म पाँतीमे ध्‍वस्‍त भ' जाइत अछि‍ - 'ऊन-काँटाक ई उन्‍मत्त कला/ई कोनो पुरुष प्रथा रहैक कि‍ प्रेमक प्रकाश/सोचै छी।'...अइ सम्‍पूर्ण कवि‍ताक ठाठ अही एक पाँती लेल तैयार भेल अछि‍। गंगेश गुंजनक कवि‍ता बूझै लेल वस्‍तुत: अइ प्रवि‍धिक बोध राखब सुसंगत हएत जे ओ कवि‍ता लि‍खै नइँ छथि‍, बेसी काल कवि‍ता करै छथि‍ अथवा कहै छथि‍। बहुत रास सांगह-पाती जुटाकए अपन ध्‍येयकें समर्थन दै छथि‍। अही कारण हुनकर कतोक कवि‍ता नमहर भ' जाइत अछि‍। कि‍छु कवि‍ता छोटे सन कायामे पूर भ' जाइत अछि‍। ध्‍यातव्‍य थि‍क कोनो कवि‍ता शब्‍द-संख्‍यासँ नइँ अपन प्रभावान्‍वि‍ति‍सँ पैघ होइत अछि‍। इएह कारण थि‍क जे उत्तराधि‍कार, सूर्य, कुसि‍यार, जीवन कहाँ छल, पतखरड़नी...सन-सन कतोक कवि‍ता आकारमे बड्ड छोट होइतहु प्रभावमे बड्ड पैघ अछि‍। मिथिलांचलमे स्‍त्रीगण द्वारा स्वेटर बुनबाक प्रथाकें जे कि‍ओ कहि‍ओ मौगि‍याही प्रथा मानि‍ नेने हेताह, अथवा अइ 'मौगि‍याही' शब्‍दक प्रयुक्‍ति‍सँ एहि‍ आचरणकें हेय मानबाक दुर्भावना मोनमे पोसने हेताह, हुनका अनुराग'क मर्मस्‍थल पर आधुनि‍कताक चोट'क अनुमान प्राय: नइँ हेतनि। गंगेश गुंजनकें छलनि‍। आधुनिकताक दबावमे समाजसँ विस्थापित हस्तकला आ भि‍न्‍न-भि‍न्‍न हस्‍तकलामे अनुगुम्‍फि‍त जीवन-मूल्‍य, अनुराग-मोह...आदि‍ कोना स'हे-स'हे घसकि‍ गेल, तकरा लोक बुझि‍यो नइँ सकलाह; गुंजनजी तकरहि‍ संज्ञाने अपन गहन अनुभूति‍क संकेत देलनि‍ अछि‍। 'कुसि‍यार' कविता अही वि‍लक्षण दृष्‍टि‍क प्रमाण थि‍क, जतए कवि माइ लेल कुसि‍यारक रूपक रचलनि‍ अछि‍।
माइ वस्‍तुत: ऋषि दधीचि‍ जकाँ सन्‍तानहि‍तमे अपन सर्वस्‍व अर्पण कइओ क' मुदि‍त रहैत अछि‍; अगरबत्ती जकाँ स्वयंकें भस्म कइओ क' दिग्दिगन्‍तकें सुवासि‍त करैत अछ- अपन आखरी पोर धरि‍ पेड़ल जाइत अछि/कुसि‍यार/पेड़ा-पेड़ा क' मि‍शीनमे सिट्ठी भ' जाइत अछि/रसहीन/तथापि एको रती बचा क' राखि‍ए लैत अछि/अपन आर्द्रता/रौद आ सूर्यकें देबा लेल खोंइचामे एको रती/आखिर सुखाइत अछि तखने आ/सिट्ठी बनि‍ जाइत अछि/गूड़ बनबा लेल बड़कैत रसक कड़ाह तर/पेनीमे धधकैत आगि‍क अंशमे पर्यन्‍त रहैत छैक/मि‍ज्‍झर सि‍ट्ठीक ओकरो आत्मा/अहीमे जरि‍ क' समाप्त होइत अछि/स्त्री कुसि‍यारेक पर्याय थि‍कीह/माइ थि‍कीह ...वि‍लक्षण रूपकमे रचि‍त छोट खुट्टीक ई वि‍राट कवि‍ता थि‍क। कुसि‍यारक रस द्वारा स्‍त्री-जीवनक बलि‍दानी अनुरागकें कोनहुँ भारतीय भाषामे अइ तरहें भरि‍सके रेखांकि‍त कएल गेल हो। 
गंगेश गुंजनक अइ संग्रहक अधिकांश कवितामे लुप्तप्राय होइत जीवन-मूल्‍य आ नीति‍-वि‍वेक पर घनघोर चिन्‍ता व्यक्त भेल अछि। 'छाउर' शीर्षक कवितामे कवि‍ मैथिल जीवनमे छाउर'क उपादेयताक उल्‍लेख अनेक सन्‍दर्भक केने छथि‍। छाउरक प्रयोजन हाथक मैल छोड़एबासँ ल' कए माछ बनबै काल,कुकूर- बिलाड़ि‍क नेंड़ी झँपबाकाल, गोंत-गोबर पोछै काल, दाँत रगड़ै काल...होइत आएल अछि‍। मिथिलांचलक अधिकांश लोक अपन पुरान दिनकें स्‍मरण करथि‍, त' हुनका गंगेश गुंजनक चिन्‍ता चौंका देतनि‍ जे छाउर आब लुप्त भ' रहल अछि। दुर्लभ वन्य-प्राणी जकाँ,गामक बूढ़-पुरान लोक जकाँ बेराबेरी विदा भेल चल जा रहल अछि छाउर!‍ गामक घूर समाप्‍त भेल जा रहल अछि‍, जड़कालामे घूर लग, चूल्‍हि‍ लग बैसि‍कए ऊष्‍मा प्राप्‍त करबाक बेवस्था खतम भ' रहल अछि‍। घूरसँ नि‍कलल जे छाउर अनेरबा कुकूर धरि‍ लेल सुखदायी होइ छल,से आब इतिहास हेबा पर तैयार अछि। आधुनि‍कताक प्रवेश,उपभोक्‍ता संस्‍कृति‍क वर्चस्‍व,वैश्‍वि‍क बाजारक दबाव समाजक जीवन-शैली कि‍छु तेना बदलि‍ देलक‍,जे आब ई पुरातन पद्धति‍ 'बूढ़-पुरान लोक' जकाँ अनुत्‍पादक, अनुपयोगी,आ तें नि‍रर्थक भ' गेल अछि‍। आधुनिकताक चटक-मटक'क दुष्‍प्रभाव पारम्‍परिकताकें क्रमश: कोना नष्‍ट करैत अछि‍,तकर संकेत अइ संग्रहक अनेक कवि‍तामे भेटैत अछि‍।
लोकतन्‍त्रक परिभाषा तकैत कवि‍ गंगेश गुंजनकें 'लोकतन्‍त्र' शीर्षक कवितामे 'इनार जकाँ लोकतन्‍त्र कतहु-कतहु/बाँचल...' देखाइ छनि। वि‍लक्षण दृश्‍य अछि‍ एतए। 'लोक' लेल 'रहस्‍य' आ 'आकाश-कुसुम' बनि‍ गेल 'लोकतन्‍त्र'क रूपक जाहि‍ तरहें कवि‍ जीवनदायी जल-स्रोतसँ देलनि‍ अछि‍, से अर्थ-छवि‍क वैराट्य उपस्‍थि‍त करैत अछि‍। 'लोकतन्‍त्र'क कामना 'लोक- जीवन'क सुभीता लेल कएल गेल छल; समाजक प्रत्‍येक प्राणी लेल सुख-सौरभ जुटएबाक व्‍यवस्‍थाक रूपमे भेल छल; जेना स'ब आँगनमे जीवनदायी जल-स्रोत 'इनार' इनार रहै छल। आधुनि‍क सुसंस्‍कृत-सुसभ्‍य समाजकें आब अइ जल-स्रोत'क कोनो खगता नइँ छनि‍; कारण हुनका 'इनार'क बोध नइँ छनि‍। आधुनि‍क समाजकें अहि‍ना 'लोकतन्‍त्र'क बोध सेहो नइँ, बोध अर्जि‍त करबाक इच्‍छो नइँ छनि‍। अइ कवि‍तामे कवि अइ वि‍कराल बि‍डम्‍बनासँ चिन्‍ति‍त देखाइ छथि‍। हुनका 'गामक सबसँ बूढ़ लोक कॉलेज जाइत/वि‍द्यार्थीकें पूछि‍ रहल छथि‍/लोकतन्‍त्र की होइ छै बौआ?कोन बड़का बि‍देसमे रहैत छैक?/अपनो गाम दि‍श अबैत छैक?'...ई 'गामक सबसँ बूढ़ लोक' ओहि‍ वर्गक प्रति‍नि‍धि‍ छथि‍, जे आजादीसँ पूर्व लोकतन्‍त्र लेल कोनो सपना गढ़ने हेताह, आब चलाचलीक बेला छनि‍; मुदा 'कॉलेज जाइत वि‍द्यार्थी' ओहि‍ वर्गक प्रति‍नि‍धि‍ छथि‍, जि‍नका सोझाँ सौंसे जीवन आ सौंसे देश छनि‍। अइ वृद्ध-युवा संवाद'क चि‍न्‍ता आजुक लोककें कोना करबाक चाही, से उद्योग अइ कवि‍तासँ कएल जा सकै'ए।
मनुक्‍खक जीवनमे भाषाक महत्त्व वि‍शि‍ष्‍ट होइत अछि‍। ई वैचारि‍क सम्‍प्रेषणक माध्‍यमे टा नइँ, मनुष्‍यक सोच-वि‍चार'क आधार होइत अछि‍। सम्‍पूर्ण सृष्‍टि‍क इति‍हास,भूगोल,कला-संस्‍कृति‍, रीत-रेबाज, ्ज्ञान-वि‍ज्ञान, उद्योग- व्‍यापार,सभ्यता-व्‍यवहार..सबहक भार एकरहि‍ कान्‍ह पर लादल‍ रहैत अछि‍। दुनि‍या जखन सूतल रहै'ए, भाषा तखनहु जागल रहैत अछि‍। कवि‍ गंगेश गुंजन 'भाषा पर बड्ड भार छैक' शीर्षक कवितामे भाषाक अइ गरि‍माकें सूक्ष्‍मतासँ उजागर केने छथि‍। माइक रूपकसँ चि‍त्रि‍त भाषाक महत्त्व वि‍शि‍ष्‍ट अछि‍। मुदा अइ कवि‍ताक सहयोगें एक बेर फेरसँ मैथि‍ल नि‍श्‍चेष्‍टा जगजि‍यार होइत अछि‍, जे 'असह पीड़ा आ अनिद्रासँ कछमछ करैए मनुष्‍य आ/तकर कोरा भ' जाग' पड़ै छैक राति‍कें भाषाकें' ... माइ जकाँ; मुदा मैथि‍ल जन छथि‍,  माइ सन महत्- स्‍थानीय भाषा लेल कोनहु टा अनुराग बाँचल नइँ छनि‍‍।
      संग्रहक आओरो कतोक रास वि‍शि‍ष्‍ट कवि‍ता अछि‍, जाहि‍ पर कतोक काल धरि‍ गप भ' सकैत अछि‍; मुदा एखन एतबे।
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