** ग़ज़ल सन **
प्रात धरि किछु राति जे रहि
जाइत अछि।
फुसफुसा कऽ बात किछु कहि
जाइत अछि।
बात पाथर सन पड़ैए करेज पर
आइयो स्त्रीगन सब सहि जाइत
अछि।
घाव कतबो गहिंर हो छुटि
जायत ओ
टीस भरि जिनगी कतहु रहि
जाइत अछि।
कथा सबहक सब समाजक एक
रंग
सऽब ठाँ गरिबे दबल रहि जाइत
अछि।
कोनहुँ घर सँ सुखक नहिं
लगनीक स्वर
भ्रम कि सत्ते कान मे रहि जाइत
अछि।
*
गंगेश गुंजन,
#उचितवक्ताडेस्क।
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