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'ग़ज़ल सन'
धार नहिं अछि बोली मे
प्रहार नहिं अछि बोली मे।
मुर्दा राजनीति जकाँ
विचार नहिं अछि बोली मे।
प्रेम अछि धार तेहन
पार नहिं अछि बोली मे।
'स' संँ 'रे' धरि बाइस श्रुतिक
सिंगार ने अछि बोली मे।
मन-विमन सब बात क़बूल
इन्कार नहिं अछि बोली मे।
केहन अहिंसा थिक ईहो
प्रतिकार नहिं अछि बोली मे।
पैघ घर छप्पन सँचार
अचार नहिं क्यो टोली में।
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गंगेश गुंजन।०८.१०.'२१.
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