💤
एहिना किछु-किछु बजैत रहब
सभ टा एहिना सहैत रहब
ईहो थिक नऽव बुधियारी
बौद्धिक जन खेलैत रहब
परिवर्तन सभ लोकक काज
ख़ुद फुरफैंसी छँटैत रहब
भरि जुलूस मोटर पर भेल
नारा टा लगबैत रहब
ओ अहाँक आहाँ ओक्कर
बाँहि मुदा पुजबैत रहब
साधारण जन अछि बौका
किछु कहि-कहि सुनबैत रहब
ऊठत तँ जनता कहियो
कतबो अनठाबैत रहब
बौके नहिं रहि जायत सदा
यैह चालि नहिं चलैत रहब
जगब' लय कोइ नहिं आओत
एते काल नहिं सुतैत रहब
बाजत तँ आदंक उठाओत
दुष्ट बुद्धि जुनि करैत रहब
। 💤
#उचितवक्ताडेस्क।
गंगेश गुंजन
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें