🌿🌿
सात टा दुपँतिया
*
।एक।
काज करी तँ एहन जेना कि
कलमक नीब करैए।
मोसिक ऋण ल क' दुआति संँ
अक्षर सब बिलहैए।
।दू।
किछु ने किछु होइत रहय,
किछु ने किछु करैत रही।
अपनो लय जरूरे आ लोकहुँ
हित चलैत रही।
।तीन।
अनेरे डगडगा गेल आंँखि
कुटकुटाय लागल
धूआँ किएक भ' जाइछ
ककरो नामक चर्चा।
।चारि।
स्नेह मे सब टा सुन्दरे सुन्दर
नहि होइ छैक
मुग्ध जे होइत रहैत छी अपने
देखि-देखिक'।
।पाँच।
एना देखिक' एकसर हमरा
बूझब नै एकसर
सौंसे गाम चलैए संगे हमर
छोटछिन म'न मे।
।छ:।
सुखायल पात जकाँ उड़ि गेल
रहितहुंँ बिहाड़ि मे
घेरि क दु:ख सब पाथर
बना हमरा बचा लेलक।
।सात।
सब दिन अपना मनोरथे पर
चढ़ि कऽ हम चललौं
घोड़ा गाड़ी मोटर धरि कहियो
सोहाएल नहिं।
#उचितवक्ताडेस्क।
गंगेश गुंजन
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें