.... पाँच टा दूपंँतिया ....
क्रान्तिवीर कवि लोकनिक इ
ढब तँ देखू।
आगिक अक्षर लीखि रहल
छथि काग़त पर।
गनि रहल अछि समय सबटा
अहाँक गारि।
सहि सकत निनानबे धरि कृष्ण
अछि काल ।
बौआ क' आशा मे कोन सौंस
सुक्खक।
क' लेलहुंँ मृगतृष्णा हम पूरा
जीवन ।
आब कहांँ बाँचल प्रतीक्षा कें
बेर।
फूल मुरुझल,सूर्य डुमला,सांँझ
भेल।
प्राण व्याकुल अछि कतेक
एकसर छी।
कोनो मुद्दैये भने लऽग मे
रहितय।
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गंगेश गुंजन
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