। दिन ।
सन्तान के श्लोक घोंखबैत,
गरहाँ रटबैत,
भोरे सँ माल जाल कें नार पुआरक
हरवाह अढ़यबाक
बड़द कें सानी काँड़ी सँ नोन पानि पिया
ह'र लाधि खेत जयबाक ताकुत रखैत,
बीच बीच मे स्नेह आ तामस करैत,
उच्चस्वर में बजैत गृहस्थ-
पिता छथि।
। राति ।
भरि दिन आश्रमी काज,
ओरिआओन मे थाकलि,
जाँघ पर हिड़ला झुला क' बच्चा कें
कोरा मे सुतबैत-सुतबैत
चौखटिए मे ओठंगि क' सूति रहलि
माय थिकीह।
|🌞|
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
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