ग़ज़ल सन
किछुए दूर गरीब-धनिक अपन
आन हयत
बदलते ई समाज तखन सब
समान हयत
.
जे ध'न जमा क' लेब बैमानी सँ
कतबो क़ानून आओत कोनहुँ इ डी
चलान हयत
जे सत्य छलय तहिया सेएखनहुंँ अछि
आइ जनहित विरुद्ध नहिं करी कखन ज्ञान हयत
.
हो खेतो तैयार बहुत जलकर
बहुताइत
पोखरि फड़त मखान,बहुत रास
धान हयत
. एहि बन्द बुद्धि काल मे खूजल
करब कते एतबो न करब कवितक मिथ्या
प्रमान हयत
. बड़का गुमान पहिली जनवरी
कें सब बर्ख
देखब दिसम्बरे मे कतबा महान्
हयत।
|🌑|
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
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