🌩️ अछि तंँ अछि !
अधे राति सँ बरसि रहलय पाथर
कठोर मेघ। एहन जड़कालाक
विकाल मे उठितहिं मन पड़लय
गाम,गामक-दू साल सँ नै छाड़ल
गेल खऽढ़ वाला ओ बाँसक
खुट्टा,झांँझन वला पुरना घर!
भरि राति गर्जल बरिसल मरखाह
मेघ !
असोराक चार सँ चुअइत ऐन
दाबाक नीचाँ कनियें कनियें टटा
बनि गेल खाधि मे ओलती मे
चुअइत-बिनु दूध वला चाह सन
गाढ़ खेराइन बुन्न !
दाबा सँ सटल छोटकी खधिया
सभक बाटी मे ढारल पतियानी
संँ बिनु दूधक चाह !
आङ्गन मे भीजल ठिठुरल तुलसी
गाछ।
नास्टेल्जिया थीक ई हमर ?
रहओ,अछि तँ।
।२।
कनिक हेर-फेर सँ भरि गामक
एहने रहैक राति भरि ठाम-ठाम
चुअइत सभ बरखा मे घर।
गिलेबा-सिमेंट संँ जोड़ल छोट-
पैघ पजेबाक घर।
कतोक महला दू महला सेहो,
सौंसे गाम।
मुदा ई मानि लेब सत्य नहिं जे
नहिं रहल गाम मे आब बाँस-
बत्तीक खढ़क एकहु टा घर।
अबस्से अछि,
कुसियारक पतलोइ सँ छाड़ल
एखनहुँ किछु खोपड़ी सन घर।
से घर ककर छैक,आब हम चीन्हि सकबै?
हमरा खाढ़ीक सभ तँ बेरा बेरी जा चुकल..
ककर चूबि रहलैए आइयो
पतलोइ छाड़ल घर ? चीन्हल हयत ?
।३।
घूर,आगिक इन्तजाम सँ पूर्ण
ज़रूरति भरि 'रैन बसेरा' तैयार,
प्रस्तुत रहबाक सरकारी हल्लाक
बादहु बूझल नहिं छैक शहर केँ जे
शीतलहरक ईहो बर्खा विकाल
काल खेपि रहलय कोना अपन
राति-दिन एखनहुँ । कतेक आसराहीन भरि देशक आयल
अनाम प्रवासी मजूर लोक !
बस्तीके बस्ती ट'गल-ठाढ़ झुग्गी
झोपड़ी सँ
भरल अछि महानगर,महान् देशक
राजधानी !
एहि बेघर,मेघ-गाछ त'र भीजैत
एतेक लोक सभ लय सरकार
किसान आन्दोलन वला कैनाडाक
शीत ताप नियंत्रित तम्बुक नहिं
मँगा सकैए ?
सरकार पर तामस उठैए ।
तामस लोकताँत्रिक अधिकार
थीक।
।४।
पर्याप्त ओढ़ना मे गरमायल
सूतल मे मेघक विकराल गर्जना,
खिड़की पर झहरैत
बरखाक खर-खर ध्वनि सँ निन्न
खुजैए।
यैह लोक सब मन पड़ैए।
बहुत कोशिश करैत छी,तैयो ने आँखि लगैए। गर्म ओढ़ना अछैत,
भोर धरि आँखि खुजले रहि जाइए।
किनका-किनका मन मे बाँचल अछि ई आ भरोसो जे राजनीति
सेहो एक टा ऋतु थिकै बदलै
छैक,बदलबे करतैक
शहरो मे सब के घर हेतैक।
🏡।🏡
#उचितवक्ताडेस्क
आठ जनवरी,'२२.
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