⚡ मोनो ने लागैए आब काजो
किछु ने फुरैए। बिनु पांँखिक
ई चिड़इ मोन पिजड़े मे उड़ैए।
सुनय ओहो ने किछुटा ओहो
भेल अछि बहीरे।दुनू तँ सरकारे
अछि जा क' फेरो ने घुरैए।
आशा बाटी मे रहबाक आब
बेर बचल नहि। किछु हो पूर
मनोरथ से साधन तक ने जुड़ैए
आने बहुतो कवि सन
हमहूँ मन्द लगइ छी।कतो बेर तंँ
बहुत जरूरी शब्दो ने फुरैए
बलधकेल भेलछि
जिनगीओ सुख-दु:ख सब। कंठ
मोकि रहलय ई,ओ
दु:ख सँ थूरैए।
|🌀| गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
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