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खत्म गेल जीवन-वसन्त ?
कतय गेल साहित्य संँ जीवक वसन्त ?
साहित्य संँ वसन्त ग़ाएब अछि जे
अछि से वसन्त नहिं वसन्ताभास
अछि।ओना तंँ विद्यापतिए कालक
नहिं तँ बेसी संँ बेसी सुमन-मधुप
काव्य कालक बासि वसन्त अछि।
अपन साम्प्रत्तिक मैथिली साहित्यहु मे नवताक कोनो उल्लेखनीय आयाम देखार नहिं अछि जे सामान्य पाठक-समाज कें सेहो पढ़ै लेल आतुर क' सकैक।
इतिहासक सुगन्धि बड़ कड़ा होइत छैक।
साधारण मन कें के कहय अधिकांँश कवि-लेखक पर्यंत कें मत्त कयने रहैत छैक यावत क्यो खूब जोर सँ नहिं झकझोरय। ई काज साहित्य आलोचकक छनि।आइयो अत्यल्पे आलोचकक लोहखर आधुनिक छनि।
रचना आ समालोचना दुहुक सामाजिक मनोभूमि एक रहितहुंँ सृजन सक्रिय होएबाक स्थिति एकहि नहिं पृथक होइत छैक। जेना राति मे कल कारखाना मे काज चलैत रहैत छैक आ टॉर्च ल क' पुलिस पहरा दैत रहैत छैक। एकहि परिस्थितिक दू टा सामाजिक उद्देश्यक काज समानांतर चलैत रहैत छैक। कल-करखानाक कार्यक युक्ति फराक आ पुलिसक फराक छैक। समस्या सेहो अपन-अपन रहैत छैक। पहिल वा पुरना सँ काज नहिं चलैत छैक तँ समाधान के युक्ति सेहो नऽव ताक' पड़ैत छैक। कोनो ने कोनो रूपक नवोन्मेष प्रायः सभ ठाम चलैत रहैत छैक। साहित्य विधा अपेक्षाकृत अलग कोटिक संवदेनशीलताक कार्य थिकैक तें सामान्य यांत्रिक कार-बार जकांँ नवोन्मेषक बारंबारता एत विशेष नहिं होइत अछि।
समालोचना में नवोन्मेष समकालीन मौलिक कृतिक कथनात्मक चुनौती सँ उत्पन्न होइत छैक। तें एतहु महत्वपूर्ण होइतहुँ आलोचनाक भूमिका कवि-लेखक क बादे उपस्थित होइत छैक। युग-युगक घोंकल पारम्परिक अनुभव-रसबोध एतय धरि जे प्रेम,करुणा आ शृंगार जन्य संवेदना तथा मानव ऐंद्रिक आवश्यक उत्तेजना मे वाँछित ऊष्मा क्षीण भ' क' पनिसोह, नोनछराइन भ' चुकल छैक। एखनुक सिंन्थेटिक बोधक ई यथार्थ क्यो स्वीकारै लेल तैयार नहिं।
सामाजिक क्रान्ति मे सेहो साहित्यक आवश्यक परन्तु सहायक भूमिका रहैत छैक। नव-जीवन चेतना-प्रवाह मे साहित्यक स्वायत्त आन्दोलन सेहो सामाजिक आन्दोलन जकाँ अपरिहार्य होइछ। साहित्य मे एम्हर तेहन प्रकारक कोनो उचाबच हमरा तंँ लक्षित नहि भेल।
तखन हमरा मन मे एकटा जिज्ञासा उठललय जे, यदि लोकतंत्र मे जनता शासक कें जवाबदेह बना सकैक अधिकारी होइत अछि तँ साहित्य मे सेहो जवाबदेही किएक ने तय कयल जा सकैए आ कयल जयबाक चाही? समाजक से लोक वा अवयव चीन्हल जयबाक चाही।से किनका आ कोना ? तकर उत्तर अछि ।
ई समाधान छैक तँ सोझ मुदा प्रथमहिं डेग पर बिलाड़िक कंठ मे घंटी बन्हबाक यक्ष प्रश्न सँ घेरायल छैक। एक मात्र अपरिहार्य चेतन अवयव छथि आलोचक विद्वान। तकरा बाद विद्वान् आलोचक। कोनहुंँ-लेखक कवि हुनका असंतुष्ट करबाक खतरा उठयबाक साहस नहि क' पबैत छथि। ताहि पर यात्री जी सन कविक आलोचक ओ ऐतिहासिक वन्दना नीम पर करैल चतारि देने छैक :
"...
यदि कीर्ति का रस चखना है
कलाकार ने फिर फिर सोचा,
आलोचक को ख़ुश रखना है'' कहि क'।
भावी सन्तति लेखक लेल तेहन उदाहरण राखि गेलाह जे आब ई चेष्टा बाट चलबाक परोक्ष लाइसेंस जकाँ काज करय लगलैए।
हम बहुत काल स्तब्ध रहि गेलौं। गोसाईं तुलसी दास खल-वन्दना हमरा तेहन अधलाह नहिं लागल।कारण जे तत्कालीन बादशाहीक दु:स्थिति मे कवि रूप मे ओ यैह क' सकय छलाह। कयलनि खल वन्दना। मुदा एहि लोकतन्त्र मे जतय कवि ओ आलोचक समाजक समान व्यक्ति एकाइ होइत छथि क्यो आन नहिं,एहना मे यात्री जी सृजनक सम्मुख दुविधा द्वैधक ई स्थान कोना निर्मित कय देलथिन?
यात्री ई व्यंग्य विनोद मे कहलथिन वा वन्दना मे से विवेचना विश्लेषणक विषय थीक मुदा न्यायाधीश वला आस्थाक सम्मान्य आलोचक पद एक टा परम प्रभुताशाली कोनो नौकरशाह वला बनय लगलैक। सर्व विधि साहित्याकाँक्षा पूर्तिक एक मात्र
आशाक केन्द्र जाहि दिस पैघ-पैघ संभावना ओ प्रतिभा कि रचनाकार टुकुर-टुकुर ताकय लगलाह। सृजन आलोचनाक नाङ्गर मुखापेक्षी होइत चलि गेल।
बेसी विस्मयकारी अनुभव तँ ई अछि जे भने बहुत सीमितहि श्रेष्ठ आलोचक कें सेहो नीक पुस्तक भेटओ तकर तेहने आतुरता रहैत छैक जेहन कोनो कवि कें नऽव लिखबाक। तें एक दिशाहे ई मानब जे आलोचक नहिं छथि से सर्वथा यथार्थ नहिं अछि।तेहन रचना सेहो तँ सोझांँ आबओ जे आलोचक उद्यत उत्प्रेरित होइथ। लाचार नहिं। आलोचनाक लाचारीक किछु तुच्छ सामाजिक कारण सेहो भ' सकैत छैक।
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साहित्य संँ वसन्त ग़ाएब अछि।जे अछि से वसन्त नहिं वसन्ताभास अछि।ओना तंँ विद्यापतिए कालक नहिं तँ बेसी संँ बेसी सुमन-मधुप काव्य कालक बासि वसन्त अछि।
मैथिली एखन साहित्य रचनाक एहि द्वन्द्वक सबदिना परिस्थितिक एही प्रश्न सँ भीड़य,तकर किछु नव चेतना सँ उपक्रम करय से अनिवार्य छैक। संसार बहुत जटिलता मे व्यापक भऽ रहल छैक। परिवर्तनक वेग अभूतपूर्व बुझा रहल अछि।सम्मुख एहि सिन्थेटिक यथार्थ के मानै लेल प्रायः क्यो तैयार नहिं बुझाइछ।
रचना आ आलोचना अपन रचनात्मक प्रकृति मे अंततः तद् युगीन नवोद्घोषक एक टा उच्च गुणवत्ताक कालध्वनीय युगल गान होइत अछि जकर अनुगूंँज सुदूर भविष्य धरि जाइत रहैत छैक।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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