बेर पर बात तँ बजबेक चाही
बौक सँ नीक लोक बजन्ता कहय
लोक कम्मे सुनैए आब ककरो
तें कि बाँचल न क्यो कहन्ता रहय
बड़ मोसीबत छै जीयब एहि मे
तें की जीवहुक ने सेहन्ता बँचय
कोनो तेहन नहिं ई न'व एखनो
समय पहिनहुँ किछु तुरन्ता रहय
हाथ मे आनक अछि सब औजार
बुद्धि श्रम हुनर अपन ई टा रहय।
…
#उचितवक्ताडेस्क।
गंगेश गुंजन
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