अपन अपन राधा

✨✨   अपन अपन राधा   ✨✨         
   आइ अकस्मात् अपन खण्ड
 काव्य 'राधा' मन पड़ि गेल।
 २००५ ई. मे लिख' लागल रही।
प्रिय गजेन्द्र ठाकुर जी,सम्पा. "विदेह" मैथिलीक प्रथम इ-पत्रिका  मे तीस कि एकतीस अंक मे स्नेह आ आग्रह सँ प्रकाशित कयने रहथि। अन्यथा हमर इहो रचना कतहु विस्मृत भ' पड़ल रहि जाइत। धन्यवाद गजेन्द्र जी।

🌸।               रा धा                ।🌸
   बूलि क' राधा आँगन अयलीह तंँ
 आश्चर्ये ठकमूड़ी लागि गेलनि।
 बीच आँगन मे कृष्ण ठाढ़, सद्यः।
 हुनकर स.बोधनक कोनो टा ने
 जबाब दैत चलि गेलीह भितर
 अपना कोठली दिस। धीरे-धीरे
 कृष्ण सेहो लागि क' पाछाँ राधाक
 पीठे पर पहुँचलखिन। एतनी काल
 मे पहुँचि जएथिन कृष्ण तकर नहि
 छलनि कनियों अनुमान।
 सरियाइयो कहाँ सकलीह आँचर
 पर्यन्त ...
  दुष्ट केहन जे पैसि गेलाक बाद
 कोठली मे खखसलनि कर्तव्य,
 कएलनि-राधा के साकांँक्ष 
 अप्रत्याशित एहि कृष्ण-कृत्य पर
 भ' गेलीह क्रोधित। जेना-तेना
 सरियबैत आँचर, तथापि घुरलीह
 पाछाँ दिस फेरलनि मुँह..कुटिल
 शृंगारोदीप्त भुवन मोहिनी बिहुँसी
 पसारने ठाढ़-श्रीकृष्ण । 
 लग आबि क' खौंझाएल पोसुआ
 बिलाड़ि जकाँ राधा ! छड़पैत सन
 क्रमे ल'ग पहुँचि कृष्णक पीताम्बरी
 झीकैत’ 'हरण कर' लगलखिन.. .                                                                                   
–'ई की, ई की करैत छें राधा ?
  किएक करैत छें एना उघार
 हमरा? देखत लोक तँ हमर की
 रहत इज्जतिक हाल ! आखिर
 पुरुखोक होइत छैक इज्जति,
 मर्यादा लज्जा, पुरुखोक चीर हरण
 होइत छैक यदि नहि रहै
 पुरुषत्व...।' 
  किन्तु हँसी-ठठा सँ राधा कनियों ने ठंढयलीह। कृष्णो बूझि ने सकलाह,राधा बजलीह किछु बा
 कनलीह..। स्नेहांक मे बन्हबाक
 हुनक मृदु प्रयास कें ताग जकाँ
 खुट तोड़लनि। खौंझायलि ओ
 एतबा जे कृष्णक केश के पकड़ि
 घीच' लगलीह। ओ रहथि नहि
 प्रस्तुत राधाक एहेन स्नेहाघातक। 
 केश तिराइत मन छटपटबैत
 कननमुँह भ' गेलाह। मुदा राधा तँ
 जेना छलीह बताहि भेलि अपन
 तामस सँ। बूझल कृष्ण धैर्य सँ ।
 सक्कत-बाँहि स्नेह सँ बन्हैत
 बुझब' लगलाह-                                ‘भेलौ की तोरा ? की बात, की
 भेलौए, बाज त किछुओ, हमरे
 सप्पत तोरा,से तँ कहै बताहि !...
 हमरो मन धधकैये कतेक दिन,
 मास-बरख सँ,कहाँ भेटैए शीतल
 स्नेहक छाहरि हमरो । तइ पर सँ
 तोरो यदि होउ एहिना हाल तँ हमर
 जीवन कोना  चलत, कहिया धरि,
 कतबा दूर से तोंही क'ह कने।…  
  आखिर की भेलनिहें हमर
 बुधियारि राधिका जी कें,बुझियै
 त। से दोख जे भेलय हमरे बुते ?
 कोना-की। हिचुकैत राधिका  कें
 करेज सँ साटि बड़ी काल कृष्ण
 अपनहुँ हिचकैत रहलाह निरन्तर
 ओतबा काल । दुहुक हिचुकब
 क्रमशः एकम एक बनल चलि
 गेलनि । राधा कें ई की भेलनि आ
 कृष्णहु कें ? दुनूक भाव आवेग
 एकात्म भ' चुपचाप बहिते
 गेल...
 जानि नहि एहि करुण चुप्पी मे
 जीवनक कतेक युग बीति गेल !
 स्थिति मे एक ध्यान प्राण सेहो
 एक।
' निन्न भ' गेलौ राधा, तों सूति गेलें की ? '                                                    कृष्णक एहि पुछैत स्वर पर चिहुँकि उठलीह राधा । उठितहि भान
 भेलनि जेना होथि ओ श्रीकृष्णक
 आलिंगन मे बीच आँगन मे ठाढि ।
 चारू कात सँ देखैत लोक,
 सर-संबन्धिक- सखि बहिनपा...।
 आकि लाज सँ व्याकुल एकहि बेर
 मे श्रीकृष्णक बाँहि सँ झकझोरि
 छोड़बैत स्वयं कें चिकरि उठलीह,
 पड़यलीह- निछोह... लत्त॓-फत्त॓।… 
  निन्न एतहि टुटि गेलनि । साँस
 फुलैत भेलीह बेसम्हार। जेना
 लोहारक भाँथी हो, ओहिना ताप
 जरैत उसाँसक भाँथी हो ई देह।
 आब भग्न स्वप्नक कर' बैसलीह
 भाग्यदशा विश्लेषण। 
  पछताइत-पछताइत मन भेलनि
 अस्तम्व्यस्त । केहन दुर्लभ सुन्दर
 स्वप्नक क' देलियैक अपने दुर्दशा।
 कि अछि एतबो नहि लिखल,केहन
 भाग्येक नहि, स्वप्नो जेना 
...होइत अछि, 
सोचथि राधा ...    
           (कतहु सँ एक अंश )
                 गंगेश गुंजन                    
            #उचितवक्ताडेस्क।

टिप्पणियाँ